ज्ञान का उपयोग वही कर पाता है जिसमें श्रद्धा हो

Contributed byमुनि जयकुमार|नवभारतटाइम्स.कॉम
true use of knowledge is possible only with faith four pillars of spiritual development
गुणों का सम्मान कहां नहीं होता। इनसे व्यक्ति को प्रतिष्ठा मिलती है। गुणों के विकास से व्यक्तित्व में निखार आता है। आध्यात्मिक विकास के लिए हमारे भीतर चार गुण होने चाहिए- ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तप। जिसमें ये चारों होते हैं, वह व्यक्तित्व का धनी होता है।

पहला गुण है ज्ञान। ज्ञान जानने का साधन है। इसके अभाव में वह अधूरा रह जाता है, क्योंकि अज्ञानता एक अभिशाप है। ज्ञान से व्यक्ति अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकता है। दूसरा गुण है, दर्शन यानी श्रद्धा, विश्वास। इससे जीवन में समरसता आती है। ज्ञान का उपयोग वही कर पाता है, जो उसे श्रद्धा के पलड़े पर रखकर तौलता है। तीसरा तत्व है चरित्र। ज्ञान और दर्शन से व्यक्ति का आचार श्रेष्ठ हो जाता है। आचार के बिना व्यक्तित्व का कोई मूल्य नहीं। दर्शन का उपयोग है जीवन के प्रति विश्वास व श्रद्धा और चरित्र का उपयोग है आचार की शुद्धि। श्रेष्ठ आचरण वाला व्यक्ति सभी जगह सम्मान पाता है। हमारे व्यक्तित्व के निखार में तप का भी बहुत बड़ा महत्व है। तप से हम अपनी बुराइयों और कमियों का शोधन कर सकते हैं। तप हमारे पुरुषार्थ की शक्ति है। इन चारों गुणों से धारक व्यक्ति जीवन विकास के शिखर पर पहुंचता है। विवेकशील व्यक्ति को पाकर ये गुण सोने में जड़े हुए रत्नों की भांति चमकने लगते हैं। व्यक्ति तभी अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है, जब उसके भीतर इन गुणों का रस मौजूद रहता है। गुणी व्यक्ति का हृदय सरल हो जाता है। वह अपने गुणों को और विकसित करने के लिए लगातार प्रयास करता रहता है। वह जीवन महत्वपूर्ण होता है, जो आनंद से भरा हो।ए
ज्ञान-दर्शन-चरित्र और तप का परिणाम है आनंदमय जीवन। हमारे भीतर आनंद का कमल सतत खिलता रहे, इसके लिए इन गुणों के सूर्य का सदा उदित रहना जरूरी है। हम अपने शांत और स्थिर मन से अच्छे गुणों वाले इंसान बनने का लगातार प्रयास करें और यह संकल्प लें कि इन गुणों से संपन्न व्यक्ति को सम्मान मिले।

(आध्यात्मिक चिंतक और ध्यान साधक)