Bottled Water Price Deception Mrp Game In A Lucknow Hotel
बोतल में छल
नवभारतटाइम्स.कॉम•
'पहले आप' की तहजीब वाले लखनऊ के एक होटल में हाल में ठहरने की जरूरत पड़ी। इस दौरान जब पीने के लिए साफ पानी मांगा, तो जवाब मिला कि बोतलबंद पानी खरीदना होगा। एक बोतल की कीमत 30 रुपये बताई गई। ब्रैंड लोकल था, मुझे लगा कि वह एमआरपी से ज्यादा कीमत वसूल रहा है। लेकिन, यह मेरा भ्रम था। होटल कर्मचारी ने बोतल पर छपा मूल्य 30 रुपये दिखा दिया। बहस वहीं समाप्त हो गई। अगले दिन पास के एक खुदरा स्टोर में वही ब्रैंड, वही आकार और वही पैकेजिंग वाली बोतल 20 रुपये में उपलब्ध थी। बिलिंग काउंटर पर पता चला कि छूट के कारण वास्तविक कीमत तो और भी कम, सिर्फ 10 रुपये प्रति बोतल पड़ रही है।
एक ही बोतल की कीमत में इतना अंतर हो तो प्रिंटेड मूल्य का अर्थ क्या रह जाता है? भारत में MRP अर्थात मैक्सिमम रिटेल प्राइस की अवधारणा काफी पहले से चली आ रही है। इसका मकसद था कि कोई विक्रेता निर्धारित मूल्य से अधिक वसूली न कर सके। लेकिन, एमआरपी एक विचित्र व्यवस्था में बदल गई है। आज उपभोक्ता अक्सर एक ही उत्पाद को कहीं MRP पर खरीदता है, कहीं उससे कम पर, कहीं उससे ज्यादा। कभी-कभी उसके लिए विशेष MRP वाली पैकेजिंग भी सामने आ जाती है। सिर्फ पानी नहीं, रोजमर्रा की दूसरी वस्तुओं में भी उपभोक्ता अक्सर इसी भ्रम से गुजरता है। रिटेल स्टोर से पता चला कि 30 रुपये की छपी कीमत वाली बोतल 10 या 20 रुपये में आराम से बेची जा सकती है। क्या इससे विक्रेता को नुकसान नहीं होता? या वह केवल एक मनोवैज्ञानिक चाल है, जिससे छूट अधिक आकर्षक दिखाई दे? इस खेल में सबसे कम जानकारी किसके पास है, उपभोक्ता के पास।आज आवश्यकता केवल मूल्य नियंत्रण की नहीं, बल्कि पारदर्शिता की है। उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार है कि किसी उत्पाद की कीमत किन आधारों पर तय की गई है। पानी जैसी अनिवार्य वस्तु के मामले में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। वैसे तो किसी होटल की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह अपने मेहमानों को पीने का सुरक्षित पानी उपलब्ध कराए। आतिथ्य उद्योग का मूल दर्शन सुविधा और सेवा है, न कि हर आवश्यकता पर अधिकतम मुनाफाखोरी। सुनने में कई लोगों को यह एक मामूली घटना लग सकती है। कुछ लोग बाहर घूमने जाते हैं तो किसी भी चीज के लिए वास्तविक लागत से काफी ज्यादा दाम चुकाना पसंद करते हैं। इसी कारण टूरिस्टों के बारे में आम धारणा बनती है कि वे गांठ के पूरे, अक्ल के थोड़े हैं। इस व्यवस्था में जो छल को समझने की कोशिश करता रहता है, वो उपहास का पात्र बनेगा।