Overtourism The Growing Threat To Indias Tourist Destinations And Solutions
ज्यादा नहीं, बेहतर पर्यटन चाहिए
नवभारतटाइम्स.कॉम•
सोशल मीडिया पर किसी खूबसूरत पहाड़, शांत झील या अनछुए पठार की एक तस्वीर वायरल होती है। अगले कुछ महीनों में वहां पहुंचने वालों की संख्या बढ़ने लगती है। सड़कें बनती हैं, पार्किंग भरती है, होटल और होमस्टे खुलते हैं, कैफे आते हैं और पर्यटकों की भीड़ उस जगह को ‘मस्ट विजिट’ बना देती है। लेकिन, इस कहानी का दूसरा हिस्सा अक्सर तस्वीर में दिखाई नहीं देता। यह हिस्सा है सूखते जलस्रोत, बढ़ता कचरा, सीवेज का दबाव, ट्रैफिक और धीरे-धीरे बदलता स्थानीय जीवन। दुनिया भर के कई ऐसे पर्यटन स्थल हैं जो इसी तरह की समस्या से जूझ रहे हैं।
क्षमता सीमित । केरल के मदायिरप्परा में 22-23 अगस्त को स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों ने इसी ओवरटूरिज्म को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। यह विरोध इसी दूसरी तस्वीर को सामने लाता है। दुर्लभ लेटराइट पठार को बढ़ते पर्यटन दबाव से बचाने की मांग केवल एक प्राकृतिक स्थल की रक्षा का सवाल नहीं है। यह उस सोच पर सवाल है जिसमें किसी जगह को लोकप्रिय बनाने की कोशिश तो होती है, लेकिन यह तय करने की तैयारी नहीं होती कि वह लोकप्रियता आखिर कितनी होनी चाहिए। पर्यटकों की संख्या अनंत हो सकती है, लेकिन किसी पहाड़, पठार, झील या जंगल की सहने की क्षमता अनंत नहीं होती।समस्या की वजह । किसी जगह पर पर्यटकों का आना अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब पर्यटकों की संख्या उस जगह के संसाधनों, जैव विविधता और स्थानीय जीवन की क्षमता से आगे निकल जाती है। स्पेन के बार्सिलोना, मलोर्का और अब मार्सेई से लेकर इटली, पुर्तगाल और ब्रिटेन के छोटे गांवों तक स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि आखिर पर्यटन किसके लिए है?
सवाल बदला जाए । भारत में भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। मनाली, शिमला, मसूरी, नैनीताल, ऋषिकेश, गोवा, लेह, कश्मीर और अब उत्तराखंड के कई शांत पहाड़ी इलाकों में पर्यटन की तेजी के साथ वही सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या सड़क, पानी, सीवेज, कचरा प्रबंधन और स्थानीय पारिस्थितिकी इतनी बड़ी संख्या में लोगों का दबाव सह सकती है? इसे ही carrying capacity के सवाल से समझा जाता है। दुर्भाग्य यह है कि पर्यटन स्थलों के विकास में अक्सर पहला सवाल होता है कि कितने पर्यटक लाए जा सकते हैं? जबकि सवाल होना चाहिए कि कितने पर्यटकों को यह जगह बिना नुकसान के संभाल सकती है? यह अंतर छोटा लगता है, लेकिन पर्यटन नीति की पूरी दिशा बदल देता है।
पहाड़ संवेदनशील । पहाड़ पहले ही भूस्खलन, अचानक बाढ़, जलस्रोतों में बदलाव और अत्यधिक बारिश जैसी घटनाओं के प्रति संवेदनशील हैं। ऐसे में कमजोर पारिस्थितिकी वाले क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण और पर्यटन दबाव जोखिम को और बढ़ा सकता है।
मुनाफे का सौदा । ओवरटूरिज्म से जूझती दुनिया में कुछ देशों ने यह स्वीकार करना शुरू कर दिया है कि कम पर्यटक हमेशा कम कमाई नहीं होते। भूटान इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। उसने लंबे समय से 'हाई वैल्यू, लो इम्पैक्ट' पर्यटन की नीति अपनाई है। पर्यटकों से सस्टेनेबल डिवेलपमेंट फी ली जाती है। पर्यटन को इस तरह नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है कि उससे पर्यावरण और स्थानीय समाज पर अनावश्यक दबाव न पड़े। थाईलैंड का Maya Bay और भी स्पष्ट संदेश देता है। अत्यधिक पर्यटन से समुद्री पारिस्थितिकी और कोरल रीफ को नुकसान पहुंचने के बाद वहां टूरिज्म को लंबे समय तक बंद किया गया। बाद में इसे नियंत्रित तरीके से फिर खोला गया।
संख्या तय हो । भारत में भी यही सोच अपनाने का समय आ गया है। हर लोकप्रिय पर्यटन स्थल के लिए पहले से तय होना चाहिए कि वहां एक दिन में कितने लोग जा सकते हैं, कितनी गाड़ियां प्रवेश कर सकती हैं, कितना निर्माण हो सकता है और कितने होटल उस इलाके की जल व सीवेज क्षमता के भीतर हैं। कुछ जगहों पर पर्यटकों की संख्या सीमित करनी पड़ सकती है। कहीं प्रवेश शुल्क बढ़ाकर संख्या नियंत्रित करनी होगी और कहीं मौसम या पारिस्थितिकी के आधार पर अस्थायी बंदी करनी होगी।
निर्णय का अधिकार । पर्यटन से होने वाली कमाई का एक हिस्सा उसी प्राकृतिक संपदा की सुरक्षा पर खर्च होना चाहिए। साथ ही, स्थानीय लोग सिर्फ दर्शक नहीं, भागीदार बनें। घर उनका है, तो यह तय करने में उनकी भूमिका होनी चाहिए कि कितना और किस तरह का पर्यटन स्वीकार्य है।