रह गई मन की बात

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gandhijis mann ki baat remained unheard discussion with lohia remained incomplete
महात्मा गांधी और राम मनोहर लोहिया के संबंध केवल राजनीतिक नहीं, आत्मीय भी थे। 26 जनवरी 1948 की शाम को गांधीजी और लोहिया प्रार्थना के बाद टहल रहे थे। उसी समय गांधीजी ने लोहिया से कहा कि उन्हें कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा करनी है। उन्होंने आग्रह किया कि रात में उनके कमरे में ही आ जाएं, ताकि आराम से बातचीत हो सके। किंतु उस रात लोहिया को गहरी नींद आ गई और वह गांधीजी के पास नहीं पहुंच सके। गांधीजी ने भी उन्हें जगाना उचित नहीं समझा। 29 जनवरी को दोनों की फिर भेंट हुई। गांधीजी ने मुस्कराते हुए कहा, 'कल शाम अवश्य आना, फिर जी भरकर बातें करेंगे।' लोहिया अगले दिन, 30 जनवरी की शाम, उसी वादे को निभाने के लिए बिरला भवन की ओर चल पड़े। लेकिन रास्ते में ही उन्हें हृदयविदारक समाचार मिला कि गांधीजी की गोली मारकर हत्या कर दी गई है। वह बदहवास होकर बिरला भवन पहुंचे। वहां भीड़ उमड़ चुकी थी और कमरे में गांधीजी का निर्जीव शरीर पड़ा था। उस क्षण लोहिया के मन में जीवन भर का ऐसा पश्चाताप जन्मा कि वह गांधीजी के अंतिम संदेश और मन की बात कभी नहीं जान सके।