शीर्ष पर ओज़ोन प्रदूषण

नवभारतटाइम्स.कॉम
ozone pollutions growing threat fatal impact on health and agriculture in cities
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट देश के शहरों में प्रदूषण की बदलती चुनौती बयान करती है। अब समस्या केवल पर्टिकुलेट मैटर नहीं रहे, ओजोन भी है और जिसका असर ज्यादा घातक है। यह इस जरूरत को दर्शाता है कि प्रदूषण कम करने के नीतियां भी इसी हिसाब से बननी चाहिए।

बढ़ता खतरा । भारत में दिल्ली-NCR का प्रदूषण हर साल सुर्खियों में रहता है, खासकर सर्दियों में। तब हवा का रंग बदल जाता है और सांस लेना मुश्किल। लेकिन, CSE की रिपोर्ट से जाहिर है कि समस्या न एक मौसम तक सीमित है और न खास इलाके तक। बढ़ता तापमान, तेज धूप, वाहनों और इंडस्ट्रीज से निकलने वाला धुआं ओजोन के स्तर को बढ़ा रहा है। चंडीगढ़, जयपुर और अहमदाबाद जैसे शहरों में भी ओजोन के स्तर का खतरनाक स्तर पर पहुंचना गंभीर चेतावनी है।
सेहत पर असर । रिपोर्ट का एक अहम निष्कर्ष यह है कि ओजोन का स्तर लंबे वक्त के लिए सामान्य से ऊपर मिला। यानी, अब लोग इसके संपर्क में ज्यादा देर तक रह रहे हैं और इसका असर भी ज्यादा होगा। ओजोन गैस की वजह से दिल और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं। विभिन्न रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में प्रदूषण की वजह से हर साल लगभग 20 लाख मौतें होती हैं। वहीं, हृदय रोग के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं, खासकर 40 से कम उम्र के लोगों में। हालांकि इन मौतों और बढ़ते मामलों का प्रदूषण से सीधा कनेक्शन तलाशने के लिए विस्तृत रिसर्च की जरूरत है और इस पर काम होना चाहिए। जब समस्या की असल गंभीरता सामने होगी, तो उसके विरुद्ध लड़ाई की रणनीति भी उसी हिसाब से तैयार करने में मदद मिलेगी।

खेती का नुकसान । क्लाइमेट चेंज से प्रभावित देशों में भारत शामिल है। हर साल गर्मियों में इसकी तपिश महसूस होती है, जैसा इस बार भी हो रहा है। मॉनसून की अनिश्चितता बढ़ती जा रही है और फसलों पर बुरा असर पड़ रहा है। इसके साथ ओजोन जैसे प्रदूषक का भी बढ़ना खेती के लिए अच्छी खबर नहीं है।

दायरा बढ़ाया जाए । सरकार ने जनवरी 2019 में नैशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) लॉन्च किया था, जिसका लक्ष्य है 131 शहरों में वायु गुणवत्ता में सुधार लाना। इसमें PM10 पर फोकस है। जाहिर है कि अब इस प्रोग्राम का दायरा बढ़ाने की जरूरत है। प्रदूषण को समझने, उसे मापने और रोकने के उपाय में बदलाव चाहिए। रिपोर्ट के आंकड़े अपने आप में सबूत हैं कि अभी तक के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं।