Is It Necessary To Be In Power For Development A Big Question Raised On Defection
क्या विकास के लिए सत्ता में होना ज़रूरी है
नवभारतटाइम्स.कॉम•
पूनम पाण्डे
महाराष्ट्र की राजनीति में हाल में हुई एक घटना ने लोकतंत्र के सामने बड़ा असहज सवाल खड़ा कर दिया है। शिवसेना (UBT) के सांसद नागेश पाटिल अष्टिकर 5 अन्य सांसदों के साथ एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना में शामिल हो गए। हालांकि यह कोई बड़ी बात नहीं रही, लेकिन दल बदलने पर पाटिल ने कहा कि उनका फैसला क्षेत्र के विकास के लिए है। उन्होंने तर्क दिया कि विकास कार्यों के लिए फंड चाहिए और उसके लिए सत्ता में होना जरूरी है। उन्होंने साफ किया कि उद्धव ठाकरे से उनकी कोई नाराजगी नहीं है।कई सवाल खड़े किए
राजनीति में दल-बदल नया नहीं है। नेता कभी वैचारिक मतभेद, कभी नेतृत्व संकट और कभी चुनावी गणित की वजह से पाला बदलते रहे हैं। लेकिन, नागेश की बात ने सीधे तौर पर सत्ता और विकास के बीच संबंध को स्वीकारा है। नागेश ने यह कहकर कि विकास के लिए सत्ता जरूरी है, लोकतंत्र और भारतीय राजनीति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सवाल है कि क्या सिर्फ सत्तासीन सांसदों के चुनावी क्षेत्रों में ही विकास होगा? क्या लोकतंत्र के दो अहम स्तंभ माने जाने वाले सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन कमजोर हो रहा है या बिगड़ गया है?
लोकतंत्र में सांसद चाहे सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के, उनके अधिकार बराबर हैं। सड़क, अस्पताल, स्कूल, बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं किसी राजनीतिक दल की कृपा नहीं, लोगों का अधिकार है। इसलिए, जब कोई सांसद ऐसा कहता है कि विकास के लिए सत्ता में होना जरूरी है, तो यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी नहीं, राजनीतिक प्रतिबद्धता पर सवाल है। भारत की संसदीय व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका सिर्फ सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं है। उसका काम सरकार को जवाबदेह बनाना, गलत नीतियों पर सवाल उठाना और उन मतदाताओं की आवाज बनना है, जिन्होंने सत्ता पक्ष को नहीं चुना। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष, दोनों की मौजूदगी जरूरी है। एक मजबूत सरकार जितनी अहम है, उतना ही जरूरी मजबूत विपक्ष का होना भी है।
फिर विपक्ष क्या करेगा
अगर देश का राजनीतिक माहौल ऐसा हो जाए कि विपक्षी जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र के विकास के लिए सत्ता पक्ष में शामिल होना पड़ेगा, तो इसका असर न सिर्फ राजनीतिक दलों, बल्कि मतदाताओं के भरोसे पर भी पड़ेगा। अगर मतदाताओं के मन में यह धारणा बन जाए कि विपक्ष मे रहकर उनके जनप्रतिनिधि कुछ नहीं कर सकते तो यह सोच लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को कमजोर करेगी।
बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी क्षेत्र के विकास की संभावनाएं इस बात पर निर्भर होनी चाहिए कि वहां का सांसद सत्ता पक्ष में है या विपक्ष में? लोकतंत्र में इसका जवाब साफ तौर पर नहीं और सिर्फ नहीं ही होना चाहिए। अगर किसी भी स्थिति में यह संदेश गया कि विकास चाहिए तो सत्ता के साथ रहना होगा, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। इसका साफ मतलब है कि विपक्ष में रहना भले ही राजनीतिक रूप से संभव है, लेकिन विकास के मामले में बेहद नुकसानदेह हो सकता है। ऐसे में फिर विपक्ष की क्या भूमिका रहेगी, विपक्ष रहेगा भी या नहीं?