चित्त को स्थिरता भीतर से मिलती है, बाहर से नहीं

Contributed byदेवेन्द्रराज सुथार|नवभारतटाइम्स.कॉम
inner peace through inner journey stability of mind comes from within not external achievements
आज मनुष्य स्वयं को दूसरों की दृष्टि में सफल और महत्वपूर्ण दिखाने में व्यस्त है। उसकी पहचान अब उसके अंतःकरण की पवित्रता से नहीं बल्कि बाहरी उपलब्धियों से तय होती है। इसी कारण, उसका मन तुलना, प्रतिस्पर्धा, असंतोष में उलझा रहता है। सचाई यह है कि चित्त की स्थिरता भीतर की यात्रा से मिलती है, बाहरी प्रदर्शन से नहीं। जिस क्षण कोई वस्तु सुविधा से बढ़कर आत्म-मूल्य का आधार बन जाए, उसी क्षण अशांति पैदा होती है। तब व्यक्ति वस्तुओं का स्वामी नहीं रहता, बल्कि उनका दास बन जाता है। आध्यात्मिक परंपराएं सत्य का स्मरण कराती हैं।

चित्त की स्थिरता दृष्टिकोण बदलने पर आती है। जब मनुष्य समझने लगता है कि संसार की हर वस्तु परिवर्तनशील है। सच यह है कि धन, यश, सौंदर्य, प्रतिष्ठा समय के साथ इनमें बदलाव आता है। जो समय के अधीन है, वह सुरक्षा का आधार नहीं बन सकता। इस सत्य का अनुभव होने पर ही व्यक्ति स्वीकार करना सीखता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन जब व्यक्ति स्वयं को इन्हीं उपलब्धियों-आकांक्षाओं से परिभाषित करता है, तब उसे हमेशा कुछ न कुछ अधूरा ही लगता है। यह ‘अपूर्णता का भाव’ ही आधुनिक उपभोगवादी संस्कृति की नींव है। वहीं, आध्यात्मिकता सिखाती है कि पूर्णता बाहर नहीं, पहले से ही भीतर विद्यमान है। इसलिए जो स्वयं को जान लेता है, उसे फिर स्वयं को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

यहीं से साक्षीभाव जन्म लेता है। साक्षीभाव का अर्थ, स्वयं को देखने की क्षमता विकसित करना। जब मनुष्य अपने विचारों, इच्छाओं, भावनाओं का केवल साक्षी बनता है, तब वह परिस्थितियों से अप्रभावित रहता है। संसार की चकाचौंध तब भी रहती है, पर वह भीतर नहीं उतरती। प्रशंसा मिलती है पर अहंकार नहीं बढ़ता, आलोचना होती है पर आत्मविश्वास नहीं टूटता। उपलब्धि से तब उन्माद नहीं आता, हानि से निराशा नहीं आती। यह स्थिति आंतरिक संतुलन की पराकाष्ठा है।