अपनी बनाई जेल में ही क़ैदी बने अंग्रेज़

नवभारतटाइम्स.कॉम
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लखनऊ की ऐतिहासिक रेजिडेंसी में कभी ठगों के लिए एक विशेष जेल हुआ करती थी। इसे देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते। सन 1835 से 1842 के बीच भारत के गवर्नर रहे लॉर्ड ऑकलैंड की बहन और प्रसिद्ध कवयित्री एमिली ईडन भी इसे देखने लखनऊ आई थीं। रेजिडेंसी देखने के बाद उन्होंने अपनी डायरी में इस जेल और वहां के हालात के बारे में विस्तार से लिखा।

ठगों का खौफ । इतिहासकारों की मानें तो 1830 और 1840 के दशक में ईस्ट इंडिया कंपनी ने विलियम स्लीमैन के नेतृत्व में ठगों के खिलाफ विशेष अभियान चलाया। तब ठग व्यापारिक मार्गों पर यात्रियों से दोस्ती कर उन्हें जहर देते या गला घोंटकर मार डालते, फिर उनका सामान लूटकर शव छिपा देते थे। अवध में पकड़े गए ठगों को रखने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने लखनऊ रेजिडेंसी परिसर में खास तौर पर ‘ठग जेल’ बनवाई। कंपनी चाहती थी कि ठगों के खिलाफ कार्रवाई का पूरा श्रेय उसी को मिले। उसके अधिकारी ठगों के आतंक के लिए नवाबी शासन की लापरवाही को जिम्मेदार बताते थे।
गवाहों का ठिकाना । इस जेल में खास तौर पर उन ठगों को रखा जाता था, जो सरकारी गवाह बन जाते थे या बनना चाहते थे। उनकी मदद से ठगों के अन्य गिरोहों का पता लगाया जाता और उनसे राज उगलवाए जाते। हालांकि, देश की सबसे बड़ी ठग जेल मध्य प्रदेश के जबलपुर में बनाई गई थी, जहां सजायाफ्ता ठगों को रखा जाता था। कई बार उन्हें फांसी भी दी जाती थी। बाद में इसे आत्मसमर्पण कर चुके ठगों और उनके बच्चों के लिए औद्योगिक प्रशिक्षण स्कूल में तब्दील कर दिया गया।

अंग्रेज कैदी । 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में 30 जून को चिनहट की लड़ाई में देशभक्त सैनिकों की जीत के बाद अंग्रेजों को रेजिडेंसी में कैद कर दिया गया। उनकी सत्ता वहीं तक सीमित होकर रह गई। ऐसी स्थिति में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने सुरक्षा कारणों से ठग जेल के कैदियों को वहां से हटाकर दूसरी जगह भेजना या रिहा करना अधिक उचित समझा।

अस्पताल बना । कुछ इतिहासकारों का कहना है कि 1857 तक ठग जेल में कैदियों की संख्या काफी कम रह गई थी, क्योंकि तब तक ठगी की प्रथा लगभग समाप्त हो चुकी थी। इसी दौरान स्वतंत्रता संग्राम में रेजिडेंसी का मुख्य अस्पताल, जो बैंक्वेट हॉल में चल रहा था, तोपों की गोलाबारी में क्षतिग्रस्त हो गया। घायलों के इलाज की व्यवस्था बनाए रखने के लिए ठग जेल की इमारत को जल्दबाजी में फील्ड अस्पताल में बदल दिया गया। यहां सैनिकों और आम लोगों, दोनों का उपचार होता था। जानकारों का मानना है कि यह अस्पताल से अधिक स्वास्थ्य लाभ केंद्र था, जिसके अवशेष आज भी रेजिडेंसी परिसर में मौजूद हैं।