नेताजी नभ में

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न जल में, न थल में। दोनों नेता मिले नभ में। कोई मामूली नेता नहीं। दोनों महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री। बस, अंतर इतना ही कि एक के आगे 'थे' लगता है और दूसरे के आगे 'हैं'। यानी एक भूतपूर्व और दूसरा अभूतपूर्व। वर्तमान सीएम हमेशा अभूतपूर्व होता है। और पूर्व सीएम कितना ही सौम्य हो, सुदर्शन हो, उसके आगे 'भूत' लगना ही लगना है। यह बहुत पुराना रिवाज है। तो किस्सा यह है कि भूतपूर्व और अभूतपूर्व दोनों एक ही प्लेन से यात्रा कर रहे थे। यह हवाई यात्रा सुनियोजित थी अथवा महज इत्तफाक, भूतपूर्व सीएम और अभूतपूर्व सीएम के अलावा अगर कोई जानता है, तो वह सातवें आसमान में रहने वाला खुदा है। दोनों के बीच बड़ी सौहार्दपूर्ण मुलाकात हुई। हालांकि यह मुलाकात कुछ ही पल की थी, लेकिन इसके कितने ही अर्थ निकल आए। कितने ही कयास लगने लगे। एक दिन बाद ही भूतपूर्व मुख्यमंत्री ने अभूतपूर्व मुख्यमंत्री के बारे में कह दिया- वह प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखेंगे, तो मैं उनका समर्थन करूंगा! अभूतपूर्व मुख्यमंत्री समझ गए कि यह दांव धोबी पछाड़ से कम नहीं है। एक तीर से दो निशाने साधे जा रहे हैं। पिछला हिसाब बराबर किया जा रहा है। लेकिन उन्होंने जवाब में कुछ कहा नहीं, बस उन्हें टेढ़ी नजर से देखा। जैसे कह रहे हों, नजर ना लगा भाऊ। बनता काम बिगड़ जाएगा। लाख दुश्मनी निभा, लेकिन दोस्त की शक्ल में नहीं।

नभ में हुई दो मुख्यमंत्रियों की इस मुलाकात पर तीसरे भूतपूर्व मुख्यमंत्री की नजर पड़ी, तो उनकी नींद उड़ गई। फिलहाल तो राज्य में उनकी उपस्थिति 'उप' की है, लेकिन दिक्कत की बात यह है कि वह कभी चुप नहीं बैठते हैं। बड़े कर्मवीर हैं, सो उनका 'मिशन टाइगर' चलता रहता है। वह साल भर सुनार की हथौड़ी लेकर ठक-ठक करते रहते हैं और दाढ़ी सहलाते रहते हैं। लेकिन मौका मिलते ही लोहार वाला हथौड़ा चला देते हैं। इधर, विभिन्न एयरलाइंस कंपनियां दुआ करती देखी गई हैं कि उनके प्लेन में तीन भूतपूर्व सीएम एक साथ कभी न बैठें। वरना उड़ते जहाज में भूकंप आने से कोई रोक नहीं पाएगा।