First Artificial Cell Made In Lab Will Unlock Secrets Of Life In A New Direction
राज़ खोलेगी लैब में बनी कोशिका
नवभारतटाइम्स.कॉम•
दुनिया में पहली बार एक ऐसी जीव कोशिका का निर्माण किया गया है, जिसका पीछे से चले आ रहे जीवन से कोई संबंध नहीं। पूरी तरह लैब केमिकल्स से बनी एक ऐसी कोशिका, जो नियंत्रित परिवेश से अपना खाना जुटाकर उससे अपनी जरूरत की चीजें और ऊर्जा हासिल करती है। किसी आम जैविक कोशिका की तरह ही यह अपने DNA की प्रतिलिपियां तैयार करती हुई अपना विकास करती है, और एक स्तर तक बढ़ जाने के बाद विभाजन के जरिये अपनी संतान भी पैदा करती है। ऐसी कोशिकाओं में इवॉल्यूशन का गुण भी देखा गया है।
अजैव से जैव । धरती पर जीवन कुछ अरब साल पहले आम गैसों और पानी से ही पैदा हुआ था। पानी और नमक जैसे पूरी तरह अजैविक पदार्थ हमारे खान-पान में शामिल होते हैं और जो अनाज, सब्जियां या मांस हम खाते हैं, वे भी पेड़-पौधों या जानवरों से आए हुए होने के बावजूद जिंदा नहीं होते। पीछे से चला आ रहा जीवन निर्जीव चीजों को अपने दायरे में लेता चलता है, लेकिन इसे ‘वन टाइम अफेयर’ ही माना जाता रहा है। यानी धरती के प्रारंभिक परिवेश में जीवन भले ही अजैव चीजों से शुरू हुआ हो, लेकिन अभी यह काम संभव नहीं। मिनेसोटा यूनिवर्सिटी में बनी कोशिका को भी फिलहाल कोई जीवित नहीं बता रहा। जीवन से दूर । खाने-पचाने, बढ़ने और विभाजन के जरिये अपनी संतति बढ़ाने में इसका व्यवहार किसी जिंदा चीज जैसा ही है, लेकिन कई मामलों में जीवन प्रक्रिया से बहुत दूर है। प्राकृतिक जीवन की तरह अंतहीन निरंतरता अभी तक इसके स्वभाव में नहीं है। चार-पांच पीढ़ियों के बाद इसका विभाजन रुक जाता है। इसकी जरूरत के सभी 36 एंजाइम और प्रोटीन बनाने वाले राइबोसोम भी बाहर से सप्लाई करने पड़ते हैं। यही वजह है कि अमेरिकी यूनिवर्सिटी की ओर से खोज को लेकर बढ़ा-चढ़ाकर दावा नहीं किया गया है।
दुनिया के लिए मायने । जीवन की गुत्थी सुलझाने की कोशिशें कई तरफ से चल रही हैं। मसलन, यह सवाल कि निर्जीव और जीवित की संधि क्या है? दूसरे शब्दों में कहें तो सबसे छोटा DNA, जो जीवन को चलाते रहने में हर दृष्टि से सक्षम हो, कितना बड़ा होना चाहिए? सृष्टि का सबसे सक्षम DNA इंसान का है, जिसमें 3 अरब बेस पेयर मौजूद होते हैं। बेस पेयर यानी जैविक सूचना की मूल इकाई। सबसे छोटा DNA अभी तक 1 लाख 17 हजार बेस पेयर्स का खोजा जा सका है, जो एक बहुत छोटे बैक्टीरिया का जीवन चलाने के लिए पर्याप्त है। मिनेसोटा में बनाई गई कोशिका में कुल 90 हजार बेस पेयर्स हैं।
सरल डिजाइन । यह कृत्रिम DNA सात तहों में बनाया गया है और इसका स्वरूप ऐसा रखा गया है कि इसकी जेनेटिक इंजीनियरिंग करना किसी रोजमर्रा के काम जैसा हो। अतीत में ऐसे जो भी काम हुए हैं, उनमें साइटोस्केलेटन का इस्तेमाल किया गया है। यानी किसी बैक्टीरिया की कोशिका को भीतर से खाली करके अपनी मर्जी के जैविक पदार्थ को उसके ढांचे में समायोजित करना। मिनेसोटा के प्रयोग की अहम बात यह है कि इसमें ढांचा भी खुद से ही बनाया गया है।
कोशिकाओं का चरित्र । दुनिया में दो किस्म की कोशिकाएं हैं। एक, जो अकेले में मगन रहती हैं। मसलन - सारे बैक्टीरिया, पेचिश और मलेरिया पैदा करने वाले प्रोटोजोआ व अमीबा। दूसरी किस्म ऐसी कोशिकाओं की है, जो अकेले में मर जाती हैं, लेकिन किसी शरीर का अंग बनकर तरह-तरह के कमाल दिखाती हैं। जैसे हमारी आंख के लेंस की कोई कोशिका हमारे लिवर की किसी कोशिका से बहुत अलग भूमिका निभाती है, लेकिन दोनों का DNA हूबहू एक जैसा होगा। जिस कृत्रिम कोशिका की धारा अभी शुरू हो रही है, देखें उसका विकास उसे किस तरफ ले जाता है।
आम उपयोग । आम जीवन में इसके इस्तेमाल को लेकर अटकलें अभी न लगाई जाएं। AI के जमाने में यह क्षेत्र तेजी से विकसित होगा। लैब में अलग तरह का जीवन बनाने को लेकर दुनिया भर की लैब में काम चल रहे हैं। जाहिर है, कृत्रिम कोशिका को लेकर भी आगे तीखी होड़ होगी। कुछ चीजें दिख रही हैं। जैसे आसानी से नष्ट हो सकने वाला प्लास्टिक, या कोई ऐसा फ्यूल जो पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाए। लेकिन, सबसे बड़ी बात तो जीवन के जटिलतम रूपों की तरफ बढ़ने की ही होगी, जिससे यह समझ बने कि मंगल ग्रह पर जीवन क्यों नहीं पनपा या चंद्रमा पर अब भी इसके लिए गुंजाइश बन सकती है क्या।