समय और प्रकृति से क़दम मिलाना सिखाती है बारिश

नवभारतटाइम्स.कॉम
rain teaches patience and harmony with nature
जो धैर्य खो देता है, वह कहीं न कहीं ईश्वर की योजना पर विश्वास भी खो देता है। वर्षाकाल केवल प्रकृति की हरियाली का मौसम नहीं, हमारी सहनशीलता और धैर्य की परीक्षा का भी समय है। यह ऋतु हमें सिखाती है कि जीवन में हर परिस्थिति हमारी इच्छा के अनुसार नहीं चलती। लगातार होती बारिश, जलभराव और बाधित दिनचर्या हमें अक्सर अधीर बना देती है। सड़क पर आगे निकलने की जल्दबाजी हो या किसी काम के लिए अनचाहा इंतजार, ऐसे क्षणों में हमारी सहनशीलता की वास्तविक परीक्षा होती है। अपनी इच्छा से लिया गया विश्राम सुखद लगता है, लेकिन परिस्थितियों के कारण आया विराम हमें बेचैन कर देता है। यही वह समय है, जब धैर्य की आवश्यकता सबसे अधिक होती है।

वर्षा हमें समझाती है कि समय और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करना ही बुद्धिमानी है। धीरज रखने से मन में साहस उत्पन्न होता है और कठिन परिस्थितियों का समाधान भी धीरे-धीरे दिखाई देने लगता है। अच्छे व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण गुण सहनशीलता है। बड़े-बुजुर्गों की सीख, बच्चों की मासूम बातें या किसी मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति का व्यवहार यदि मनोनुकूल न भी हो, तब भी संयम बनाए रखना हमारे संस्कारों का परिचायक है। आज तनाव और भागदौड़ भरे जीवन में छोटी-सी असुविधा भी हमें क्रोधित कर देती है, क्योंकि सहनशीलता का अभ्यास कम होता जा रहा है।
हमारे धर्मग्रंथ धैर्य के प्रेरक उदाहरणों से भरे हैं। सीता-हरण के बाद भगवान श्रीराम ने वर्षा ऋतु समाप्त होने तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की, फिर खोज अभियान आरंभ किया। शबरी और देवी अहिल्या ने भी अटूट धैर्य का परिचय दिया। संत कबीर का जीवन भी सहनशीलता का प्रतीक रहा है। विपरीत परिस्थितियां ही मनुष्य की वास्तविक परीक्षा होती हैं। जो धैर्य और सहनशीलता बनाए रखता है, वही समय के साथ सामंजस्य स्थापित कर सफलता और आत्मिक संतोष प्राप्त करता है।