सतलुज फिल्म विवाद: कंवलजीत सिंह ने किरदार निभाने की चुनौती और रिलीज बाधाओं पर की बात
सतलुज फिल्म विवाद: कंवलजीत सिंह ने किरदार निभाने की चुनौती और रिलीज बाधाओं पर की बात
NewsPoint•
मुंबई, 7 जुलाई। अभिनेता और गायक दलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर चल रही राजनीतिक बयानबाजी के बीच, वरिष्ठ अभिनेता कंवलजीत सिंह ने मंगलवार को विशेष बातचीत में फिल्म से जुड़े कई अहम पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी भी कलाकार का पहला फर्ज अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाना होता है, जबकि फिल्म के बाद होने वाले विवादों का फैसला संबंधित संस्थाओं और निर्माताओं का होता है। कंवलजीत सिंह ने बताया कि ‘सतलुज’ में उन्होंने अपने करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण किरदार निभाया, जो एक बेहद बेरहम इंसान का था। यह पहली बार था जब वे इतने क्रूर किरदार में दिखे। उन्होंने बताया कि यह किरदार पंजाब के एक वरिष्ठ अधिकारी से प्रेरित था, और उन्होंने उस अधिकारी के बारे में इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी पढ़ी, उनके भाषण सुने और उनके व्यक्तित्व को समझने की कोशिश की। हालांकि, निर्देशक ने उन्हें किसी की नकल करने के बजाय अपने अभिनय से किरदार को जीवंत बनाने का निर्देश दिया था। मेकअप की वजह से लोग उन्हें उस अधिकारी जैसा समझने लगे थे।
फिल्म की रिलीज में आ रही बाधाओं पर कंवलजीत सिंह ने कहा कि किसी फिल्म के रिलीज न होने के पीछे सिर्फ विवाद ही नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और अन्य व्यावहारिक कारण भी हो सकते हैं। जब किसी फिल्म पर सालों की मेहनत के बाद भी वह दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती, तो कलाकारों और पूरी टीम को स्वाभाविक रूप से निराशा होती है। उन्होंने इसकी तुलना एक लेखक द्वारा सालों की मेहनत से लिखी गई किताब के प्रकाशित न होने से की। कंवलजीत सिंह ने विश्वास जताया कि ‘सतलुज’ एक दिन जरूर रिलीज होगी। उन्होंने कहा कि इस फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति, चाहे वह स्पॉट बॉय हो, तकनीशियन हो या निर्देशक, सभी ने पूरी लगन से काम किया है। इसलिए पूरी टीम की यही इच्छा और प्रार्थना है कि दर्शकों को उनका काम देखने का अवसर मिले।कंवलजीत सिंह ने फिल्म से जुड़े विवादों का जिक्र करते हुए कहा कि यह मामला करीब ढाई से तीन साल तक विभिन्न स्तरों पर चलता रहा। उन्होंने फिल्म के निर्माताओं और निर्देशक की सराहना की कि बाहरी दबावों के बावजूद उन्होंने अपने रुख से समझौता नहीं किया। एक समय फिल्म में बड़ी संख्या में कट लगाने की बात कही गई और बाद में इसे कनाडा फिल्म फेस्टिवल से भी वापस ले लिया गया। उन्होंने कहा कि समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं और समाज संवाद के माध्यम से समाधान खोज सकता है। इसलिए लंबे समय बाद फिल्मों को लेकर भय या टकराव की मानसिकता उचित नहीं है।
अभिनेता ने इस बात पर जोर दिया कि जब किसी कलाकार को कोई भूमिका मिलती है, तो उसके मन में सबसे पहले विवाद नहीं, बल्कि कहानी और किरदार आता है। यदि कलाकार हर समय यह सोचता रहे कि फिल्म पर कैसी प्रतिक्रिया आएगी, तो वह अपने अभिनय पर पूरा ध्यान नहीं दे पाएगा। कलाकार का कर्तव्य है कि वह अपने किरदार को पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ पर्दे पर उतारे। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि यदि किसी विषय पर आशंकाएं हैं, तो फिल्म निर्माण शुरू होने से पहले ही आवश्यक मंजूरियां और आपत्तियों का समाधान कर लिया जाना चाहिए। फिल्म बनने के बाद जब उस पर भारी निवेश, समय और मेहनत लग चुकी हो, तब उसे रोकना या बड़े बदलाव की मांग करना पूरी टीम के साथ अन्याय है।
कंवलजीत सिंह ने कहा कि भारतीय सिनेमा में रचनात्मक अभिव्यक्ति और संवेदनशील विषयों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। उनका मानना है कि संवाद, पारदर्शिता और समय रहते निर्णय लेने से ऐसी परिस्थितियों से बचा जा सकता है, जिससे कलाकारों और निर्माताओं की वर्षों की मेहनत व्यर्थ न जाए। उन्होंने बताया कि फिल्म ‘सतलुज’ में उन्होंने अपने करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण किरदार निभाया। यह पहली बार था, जब वे इतने बेरहम इंसान का किरदार निभा रहे थे। उन्होंने पहले भी ऐसे किरदार निभाए थे, लेकिन वह किरदार इतना बेरहम नहीं था। यह दिलचस्प था, जब उन्हें बताया गया कि वे एक खास व्यक्ति का किरदार निभाने जा रहे हैं। यह एक ऐसी कहानी थी जो सच है और जिसके बारे में कभी बात नहीं हुई, जो हमारे इतिहास का हिस्सा है और इसीलिए उन्हें इसमें दिलचस्पी हुई।
उन्होंने बताया कि फिल्म में उनका किरदार पंजाब के एक वरिष्ठ अधिकारी से प्रेरित था। भूमिका की तैयारी के लिए उन्होंने उस अधिकारी के बारे में इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री पढ़ी, उनके भाषण देखे और उनके व्यक्तित्व को समझने की कोशिश की। हालांकि निर्देशक ने स्पष्ट निर्देश दिया कि वे किसी की नकल न करें, बल्कि अपने अभिनय के जरिए किरदार को जीवंत बनाएं। शायद मेकअप की वजह से लोग उन्हें उस अधिकारी जैसा समझने लगे।
फिल्म की रिलीज में आई बाधाओं पर उन्होंने कहा कि कई बार किसी फिल्म के रिलीज न होने के पीछे केवल विवाद ही कारण नहीं होते। आर्थिक, तकनीकी और अन्य व्यावहारिक कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। जब किसी फिल्म पर वर्षों तक मेहनत की जाती है और वह दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती तो कलाकारों और पूरी टीम को स्वाभाविक रूप से निराशा होती है। उन्होंने इसकी तुलना एक लेखक द्वारा वर्षों की मेहनत से लिखी गई किताब के प्रकाशित न होने से की।
कंवलजीत सिंह ने विश्वास जताया कि ‘सतलुज’ एक दिन जरूर रिलीज होगी। इस फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति, चाहे वह स्पॉट बॉय हो, तकनीशियन हो या निर्देशक, सभी ने पूरी लगन से काम किया है। ऐसे में पूरी टीम की यही इच्छा और प्रार्थना है कि दर्शकों को हमारा काम देखने का अवसर मिले। उन्होंने फिल्म से जुड़े विवादों का जिक्र करते हुए कहा कि यह मामला करीब ढाई से तीन साल तक विभिन्न स्तरों पर चलता रहा। फिल्म के निर्माताओं और निर्देशक की सराहना होनी चाहिए। बाहरी दबावों के बावजूद अपने रुख से समझौता नहीं किया। एक समय फिल्म में बड़ी संख्या में कट लगाने की बात कही गई और बाद में इसे कनाडा फिल्म फेस्टिवल से भी वापस ले लिया गया। समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं और समाज संवाद के माध्यम से समाधान खोज सकता है। इसलिए लंबे समय बाद फिल्मों को लेकर भय या टकराव की मानसिकता उचित नहीं है।
अभिनेता ने कहा कि जब किसी कलाकार को कोई भूमिका मिलती है तो उसके मन में सबसे पहले विवाद नहीं, बल्कि कहानी और किरदार आता है। यदि Actor हर समय यह सोचता रहे कि फिल्म पर कैसी प्रतिक्रिया आएगी, तो वह अपने अभिनय पर पूरा ध्यान नहीं दे पाएगा। कलाकार का कर्तव्य है कि वह अपने किरदार को पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ पर्दे पर उतारे। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि यदि किसी विषय पर आशंकाएं हैं तो फिल्म निर्माण शुरू होने से पहले ही आवश्यक मंजूरियां और आपत्तियों का समाधान कर लिया जाना चाहिए। फिल्म बनने के बाद जब उस पर भारी निवेश, समय और मेहनत लग चुकी हो, तब उसे रोकना या बड़े बदलाव की मांग करना पूरी टीम के साथ अन्याय है।
कंवलजीत सिंह ने कहा कि भारतीय सिनेमा में रचनात्मक अभिव्यक्ति और संवेदनशील विषयों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। मेरा मानना है कि संवाद, पारदर्शिता और समय रहते निर्णय लेने से ऐसी परिस्थितियों से बचा जा सकता है, जिससे कलाकारों और निर्माताओं की वर्षों की मेहनत व्यर्थ न जाए।