@timesofindia.comnनई दिल्ली : आपको निष्पक्ष होना होगा। संस्था को बदनाम करना बंद करें। दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान यह कड़ी टिप्पणी करते हुए साफ कहा कि किसी वायरल विडियो या मीडिया रिपोर्ट के आधार पर किसी पुलिस अधिकारी को बिना सुनवाई के दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने यह भी पूछा कि आज पूरी दिल्ली पुलिस कटघरे में है? तो क्या उन्हें एफआईआर दर्ज करना बंद कर देना चाहिए?
जस्टिस गिरीश कठपालिया ने ये टिप्पणियां ज़ारनिगार फातिमा की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान कीं, जिसमें उन्होंने अडिशनल डीसीपी (नॉर्थ-ईस्ट) संदीप लांबा से विभागीय जांच हटाकर किसी दूसरे अधिकारी को सौंपने की मांग की। फातिमा का आरोप था कि मार्च 2025 में उन्हें गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया और इस मामले की जांच ऐसे अधिकारी की निगरानी में हो रही है, जिन पर हाल ही में जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान एक महिला को कथित तौर पर थप्पड़ मारने का आरोप लगा है।
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट सुफियान सिद्दीकी ने दलील दी कि अधिकारी के खिलाफ सामने आए विडियो और मीडिया रिपोर्ट निष्पक्ष जांच पर सवाल खड़े करते हैं। इसलिए जांच नॉर्थ-ईस्ट डिस्ट्रिक्ट के बाहर के किसी वरिष्ठ अधिकारी को सौंपी जानी चाहिए।
इस पर कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लग जाना और उसका दोष सिद्ध होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। जस्टिस कठपालिया ने कहा, अगर अधिकारी ने कोई गलत किया है तो उसे कानून के मुताबिक नतीजे भुगतने होंगे, लेकिन क्या मैं सिर्फ आरोपों के आधार पर उसकी छवि खराब कर दूं? क्या मैं बिना सुनवाई के उसे दोषी मान लूं?
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी एक कथित घटना के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं होगा कि अधिकारी हर मामले में निष्पक्षता से काम नहीं करेगा। हाई कोर्ट ने दोहराया कि न्यायिक प्रक्रिया आरोपों के बजाय साक्ष्यों पर चलती है और किसी व्यक्ति को सुनवाई का पूरा अवसर दिए बिना उसके खिलाफ निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल स्टैंडिंग काउंसिल ने अदालत को बताया कि फातिमा की शिकायत पर विभागीय जांच पहले ही पूरी हो चुकी है। उनका बयान दर्ज किया जा चुका है और जांच रिपोर्ट अंतिम फैसले के लिए सक्षम प्राधिकारी के पास भेज दी गई है।
इन तथ्यों को देखते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि जिस जांच को दूसरे अधिकारी को सौंपने की मांग की गई, वह प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है। इसलिए अब अदालत के दखल का कोई आधार नहीं बचता। इसी के साथ अदालत ने याचिका को निष्फल (इन्फ्रक्टुअस) बताते हुए खारिज कर दिया। फैसले के दौरान हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि वायरल विडियो और सार्वजनिक धारणा के आधार पर किसी अधिकारी या संस्था को दोषी ठहराना न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता।