तपेंगे नहीं, अब तपाएंगे

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'यार, स्टूडेंट होना भी अजीब शै है। अपने साथ साथ पूरे जमाने का हिसाब रखना पड़ता है। जमाना न जाने कितना नाउम्मीद है कि अपनी हर उम्मीद पूरी करने की जिम्मेदारी हम पर ही डाल देता है।' बल्लू बाशा अपने दोस्त के हाथ धरे हुए मस्ती में गपियाता चला जा रहा था।

दोस्त ने हामी भरते हुए कहा, ' जिसे देखो वही बच्चों के सहारे अपने ख्वाब पूरे करने में जुटा है। किसी को डॉक्टर बनना था, किसी को इंजीनियर बनना था, नहीं बन पाया तो अब अपने बच्चे के पीछे पड़ा है।' बच्चों की बातचीत रोचक हुई जा रही थी। ' सभी लोग बच्चों का भला ही करने के लिए ऐसा करते हैं।' मैंने टुकड़ा जोड़ा।
बल्लू ने पहले तो सलाम दागा, फिर बाउंसर मारा। ' सोचते हैं, तो कुछ करना भी चाहिए। नए कॉलेज खोल नहीं पा रहे। जो हैं, उनमें सबके लिए सीटें नहीं हैं। लैब बाबा आदम के जमाने की हैं। हॉस्टल के हर बाथरूम का टैप लीक मिलेगा।' इतना सुनना था कि उसके दोस्त ने मुस्कुराते हुए जोड़ा, ' पेपर लीक के सामने टैप लीक की पड़ी है तुम्हें?'

बच्चों को समझाने के लिए पहले तो मैंने गुरु गंभीर मुद्रा बनाई। फिर गोल गोल मुंह बनाते हुए कहा, ' पढ़ने लिखने के लिए बहुत तप करना पड़ता है। ध्यान पढ़ाई पर हो तो बाकी चीजें गौण हो जाती हैं। मेहनती बच्चे सफल हो ही जाते हैं, चाहे जो भी बाधा आए। जो कामयाब नहीं हो पाते, वे असुविधाओं का रोना रोते हैं।'

बल्लू ने मुझे देखा और फिर मुस्कुराया, जैसे तरस खा रहा हो। ' आपकी पीढ़ी तप करने के चक्कर में खर्च हो गई अंकल। बर्दाश्त करने, आवाज न उठाने, जो है जैसा है, उसे स्वीकार कर लेने का नतीजा सामने है। इस फलसफे की फांस में अपन टॉप नंबर लाकर भी दाखिले के लिए धक्के खा रहे हैं। कॉलेजों की सीटों की करोड़ों में बोली लगने लगी है। अपनी तपस्या अपने पास रखिए। अपन तपेंगे नहीं, अब तपाएंगे।'