सुख हो या दुख, समान रहने की सीख देते हैं श्रीकृष्ण

Contributed byचेतनादित्य आलोक|नवभारतटाइम्स.कॉम
remain equal in happiness and sorrow lord krishnas lesson to abandon neutrality
तटस्थता का अर्थ है किसी मामले में भागीदारी से बचना, निश्चित दूरी बनाकर चलना अथवा मूकदर्शक बने रहना। सितंबर 2024 में उज्जैन में फुटपाथ पर महिला से दिनदहाड़े दुष्कर्म की घटना हो या अप्रैल 2026 में मथुरा में 17 वर्षीय पीड़िता की मदद के लिए किसी का आगे न आना, ऐसे कई मामलों में भीड़ तमाशबीन बनी रही। यही तटस्थता है, जिसमें लोग यह सोचकर सहायता के लिए आगे नहीं आते कि कोई और मदद कर देगा। कभी-कभी कानूनी पचड़ों के डर से वे तटस्थ रहना स्वीकार करते हैं। मनोविज्ञान की भाषा में इस व्यवहार को ‘ बायस्टैंडर इफेक्ट ’ कहा जाता है।

तटस्थता का यह भाव अकर्मण्यता का घातक और अमानवीय रूप है। भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में तटस्थता त्यागने के लिए कहते हैं। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन ने युद्ध के भीषण परिणामों से घबराकर तटस्थ रहने का निर्णय लिया, तब स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे तटस्थता का व्यवहार त्यागने के लिए कहा। अर्जुन को आशंका थी कि युद्ध में अपने कुल के ही लोगों को मारने से पाप लगेगा। इसी वजह से वह तटस्थ रहना चाहते थे। श्रीकृष्ण ने अर्जुन की आशंका का समाधान करते हुए कहा कि उन्हें अपने कर्मों के परिणाम के प्रति आसक्ति रखे बिना, अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। कर्म के प्रति ऐसा दृष्टिकोण उन्हें पाप का भागी बनने से बचा लेगा। श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘सुख-दुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।। 38।।’
अर्जुन के माध्यम से श्रीकृष्ण हमें यह सीख देते हैं कि जीवन के द्वंद्वों में परस्पर मानसिक संतुलन बनाकर चलना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से अनेक लोग इसका गलत अर्थ लगाकर कर्तव्य के प्रति तटस्थ हो जाते हैं। ऐसे लोगों को श्रीकृष्ण के जीवन से सीख लेनी चाहिए। उन्होंने सदैव जुड़ाव बनाकर चलने को चुना। वह कभी किसी विषय में तटस्थ होकर किनारे नहीं हुए। हमेशा भागीदारी निभाकर जिम्मेदारी स्वीकार की। दरअसल, तटस्थता में दुख, निराशा और अहंकार है। इसलिए हमें भी भागीदारी निभानी चाहिए।