युवा चाहते हैं जवाबदेही, बेहतर व्यवस्था

नवभारतटाइम्स.कॉम
youth demand accountability and better education system ministers resignation ignites hope
एक तस्वीर ने पिछले सप्ताह लोकतंत्र की ताकत दिखाई। छात्र आंदोलन के प्रतिनिधि केंद्र सरकार के मंत्रियों के साथ बैठकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे जैसे गंभीर मसले पर चर्चा कर रहे हैं। सोशल मीडिया के बूते चंद महीने पहले शुरू हुआ यह आंदोलन 12 बरस पुरानी सरकार से बराबरी के स्तर पर संवाद कर रहा। यही इसकी बड़ी खासियत और लोकतंत्र की असल पहचान है।

लोकतंत्र की ताकत । इसने दिखाया कि भारत का लोकतंत्र अब भी जीवंत है। हम भले ही सरकार की आलोचना करें, लेकिन उसे पूरी तरह अलोकतांत्रिक नहीं कह सकते। कोई भी अलोकतांत्रिक सरकार लाठीचार्ज के बाद बात नहीं करती। अगर वह बातचीत के लिए तैयार होती है और अपने मंत्रियों को प्रदर्शनकारियों के पास भेजती है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। हालांकि, यह सच है कि स्टूडेंट्स को बात मनवाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा, लेकिन उनकी आवाज सुनी गई। यही लोकतंत्र की ताकत है।
पद संग जिम्मेदारी । इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा संदेश जवाबदेही की वापसी है। जनता को लगने लगा था कि सत्ता में बैठे लोग किसी भी हाल में अपना पद नहीं छोड़ते। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने इस सोच को बदला। हां, यह सच है कि सिर्फ इस्तीफा देने से व्यवस्था नहीं बदलती, लेकिन इससे यह पता चलता है कि पद के साथ जिम्मेदारियां भी हैं। इससे कुर्सी संभालने वाले अगले नेताजी को भी अहसास होता है कि गलती या लापरवाही की कीमत उन्हें भी चुकानी पड़ेगी।

बदलाव का लक्ष्य । इस आंदोलन ने यह भी दिखाया कि हमारे बच्चे निडर, जागरूक और संगठित हैं। उन्होंने सिर्फ सोशल मीडिया पर नाराजगी जताने के बजाय सड़कों पर उतरकर अपनी बात रखी। उनके लिए मंत्री का इस्तीफा उपलब्धि था, आखिरी लक्ष्य नहीं। यही सोच बताती है कि नई पीढ़ी महज विरोध नहीं, बल्कि जवाबदेही और बेहतर व्यवस्था चाहती है। यह लोकतंत्र के लिए सही है, लेकिन इस प्रकरण से कई चुनौतियां भी दिखी हैं।

छवि पर सवाल । स्टूडेंट्स के इस आंदोलन ने सुप्रीम कोर्ट की छवि पर भी कई सवाल खड़े किए हैं। आंदोलन की शुरुआत अदालत की एक टिप्पणी के बाद हुई और बाद में दी गई सफाई से भी हालात नहीं बदले। सर्वोच्च न्यायालय को हम नागरिक के आखिरी सहारे के तौर पर देखते थे, लेकिन शीर्ष अदालत के हालिया फैसलों और टिप्पणियों को लेकर असमंजस बढ़ा है। अब अदालतें किस मामले में कब दखल देती हैं, कब चुप्पी साध लेती हैं, इसे समझना मुश्किल हो गया है।

निष्पक्षता धूमिल । आंदोलन ने दिखा दिया कि न्यूज चैनल जमीनी हकीकत नहीं दिखाते। वहीं, सोशल मीडिया और कई डिजिटल प्लैटफॉर्म पर लोगों को आंदोलन की जानकारी अलग-अलग नजरिये से मिली। अब दर्शकों का भरोसा यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर भी बढ़ रहा है। न्यूज चैनल को भी इन्हीं के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी। निष्पक्ष और विश्वसनीय खबर देने वाली उनकी पुरानी पहचान भी पहले जैसी नहीं रही।

सरकार का रवैया । इस प्रोटेस्ट ने सरकार के रवैये पर भी सवाल खड़े किए। शिक्षाविद् सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल पर लंबे समय तक चुप्पी साधने और फिर स्टूडेंट्स पर लाठीचार्ज ने यह दिखाया कि सरकार बातचीत के बजाय उन पर हुक्म चलाना चाहती है। हालांकि, बाद में पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून और समिति का गठन जरूरी कदम है, लेकिन सिर्फ सजा और ब्यूरोक्रेसी के बूते इस समस्या का समाधान नहीं होने वाला। लोकतंत्र में समय पर संवाद, लोगों की बात सुनना और भरोसा बरकरार रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

बदलाव जरूरी । अगर भारत इस मौके का फायदा उठाना चाहता है, तो विमर्श सिर्फ पेपर लीक, नई प्रौद्योगिकी लाने या फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। असल जरूरत परीक्षा व्यवस्था पर नए सिरे से विचार करने की है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि शिक्षा महज दिमाग में जानकारी भर देना नहीं। आज की परीक्षा प्रणाली का भी रटने और अंकों पर ज्यादा जोर है। यही औपनिवेशिक सोच की विरासत है। नतीजतन, पेपर लीक जैसी समस्याएं आज भी हैं। जब तक परीक्षा का दबाव और उसका महत्व कम नहीं होगा, ऐसी घटनाएं पूरी तरह नहीं रुकेंगी। इसलिए शिक्षा को समझ, कौशल और सीखने पर आधारित बनाने की दिशा में बदलाव सबसे जरूरी कदम है।

(लेखक विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में रिसर्च डायरेक्टर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)