जवाहरलाल नेहरू ने 13 मई 1952 को देश के पहले लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। वह 27 मई 1964 को अपने निधन तक कुल 4,398 दिन इस पद पर रहे। संवैधानिक इतिहास के जानकारों के अनुसार, 15 अगस्त 1947 को नेहरू केवल एक अंतरिम सरकार के प्रमुख थे, जो संविधान सभा के प्रति जवाबदेह थी और वही संविधान सभा अस्थायी संसद के रूप में कार्य कर रही थी। आज नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में 4,399 दिन पूरे करके नेहरू के इस कार्यकाल को पीछे छोड़ चुके हैं। मोदी और नेहरू, भारत के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं, लेकिन दोनों एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश करते हैं। उनका पालन-पोषण, सोच, विश्वास, स्वभाव, कार्यशैली, मूल्य और राजनीतिक दर्शन एक-दूसरे से बिल्कुल अलग रहे हैं।
अलग-अलग बचपन
नेहरू का बचपन बेहद समृद्ध माहौल में बीता। उनके बैरिस्टर पिता के 42 कमरों वाले भव्य घर में अंग्रेज गवर्नेस, आयरिश शिक्षक और कई नौकर-चाकर थे। बाद में उन्होंने हैरो स्कूल में शिक्षा प्राप्त की, जहां ब्रिटिश अभिजात वर्ग अपने बच्चों को पढ़ाता था। फिर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज में अध्ययन किया। अपनी आत्मकथा में नेहरू ने लिखा है कि उनके घर में बगीचा, टेनिस कोर्ट, स्विमिंग पूल और सवारी के लिए एक टट्टू (पोनी) भी था। उन्होंने अपने बचपन को 'सुरक्षित और घटनाहीन' बताया था।
दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। वह अपने पांच भाई-बहनों के साथ रहते और उनके पिता रेलवे स्टेशन पर चाय की छोटी-सी दुकान चलाते थे। परिवार एक छोटे, अंधेरे और बिना बिजली वाले घर में रहता था, जहां भोजन भी सीमित मात्रा में उपलब्ध होता। मोदी ने स्थानीय भाषा के स्कूल में शिक्षा प्राप्त की।
नरेंद्र मोदी के घर में अखबार, टूथब्रश, टूथपेस्ट, शॉवर, शौचालय या नल का पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं। 17 वर्ष की आयु में उन्होंने आध्यात्मिक खोज की व्यक्तिगत यात्रा के लिए घर छोड़ दिया और फिर कभी स्थायी रूप से वापस नहीं लौटे। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि बचपन में जब उन्होंने अपने पिता को आयातित लाल वाइन (रेड क्लैरेट) पीते देखा, तो उन्हें लगा कि वह खून पी रहे हैं और वह हैरान रह गए थे। दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी ने बचपन में अपनी मां को दूसरों के घरों के बर्तन साफ करते देखा। उस समय राख में मिले कांच के छोटे टुकड़ों से उनकी उंगलियां अक्सर कट जातीं।
चीन को समझने में चूक
नेहरू की सुसंस्कृत अंग्रेजी और ब्रिटिश शैली ने देश के अभिजात वर्ग को आकर्षित किया, जिन्हें लगता था कि वह उन्हीं में से एक हैं। नेहरू अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को लेकर सजग थे और देश को अपने फैबियन समाजवादी विचारों के चश्मे से देखते थे, जिसकी कीमत भारत को चुकानी पड़ी।
उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय में अनावश्यक देरी की, जनमत-संग्रह का वादा किया, मामला संयुक्त राष्ट्र में ले गए और भारतीय सेना को उस पूरे क्षेत्र पर कब्जा करने की अनुमति नहीं दी, जिसका एक हिस्सा बाद में स्थायी रूप से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के रूप में रह गया। इसी तरह, चीन पर नेहरू के भरोसे के कारण भारत को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण अक्साई चिन क्षेत्र खोना पड़ा। नेहरू ने कभी इसे महत्वहीन बंजर भूमि बताया था। उन्होंने सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत पाकिस्तान को सिंधु नदी प्रणाली के अधिकांश जल का उपयोग मिला। इस विषय पर नेहरू ने पानी को लेकर हो रहे विवाद को बहुत महत्व नहीं दिया था।
72 वर्ष बाद, नरेंद्र मोदी ने कश्मीर से विशेष दर्जा हटाकर एक ऐसा संवैधानिक कदम उठाया, जिसे लंबे समय तक लगभग असंभव माना जाता था। यह विशेष दर्जा पाकिस्तान के प्रचार को बल देता था। मोदी सरकार ने सिंधु जल संधि को निलंबित करने का निर्णय लेकर पाकिस्तान पर रणनीतिक दबाव बनाया। मोदी ने सीमाओं की सुरक्षा के लिए सक्रिय और संतुलित सैन्य प्रतिक्रिया की नीति को आकार दिया और देश की सुरक्षा को मजबूत किया।
इसके बावजूद, बौद्धिक अभिजात वर्ग का एक हिस्सा नरेंद्र मोदी जैसे जमीनी पृष्ठभूमि से आने वाले नेताओं को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाता, क्योंकि वह पारंपरिक अभिजात वर्ग की पृष्ठभूमि या अंग्रेजी शैली से नहीं आते। उनकी उपलब्धियों को स्वीकार किया जाता है, पर उन्हें 'अपनों में से एक' नहीं माना जाता।
प्रशासनिक समझ का अंतर
कई पीढ़ियों के नौकरशाहों के अनुभव के अनुसार मोदी काम करते हुए सीखने की असाधारण क्षमता रखते हैं। वह ध्यान से सुनते हैं, जिज्ञासु रहते हैं, छोटी से छोटी जानकारी में भी गहराई से जाते हैं, लगातार समीक्षा करते हैं, निर्णय लेते हैं और कार्यान्वयन पर नजर रखते हैं। उनकी कार्यशैली में अधूरी तैयारी या लापरवाही के लिए कोई जगह नहीं।
नेहरू को बारीकियों और विवरणों में दिलचस्पी नहीं थी। उनका स्वभाव भावुक था, वह अक्सर भावनाओं के आधार पर फैसले लेते, अपने विचारों पर अड़े रहते और एक औसत प्रशासक थे। नेहरू के प्रशंसक जेआरडी टाटा ने एक रेकॉर्डेड इंटरव्यू में कहा था कि नेहरू को अर्थशास्त्र पर चर्चा में कोई खास रुचि नहीं थी। बातचीत के दौरान वह अक्सर खिड़की से बाहर बगीचे में खेल रहे एक विशाल पांडा को देखने लगते थे।
नेहरू ने सोवियत शैली की पंचवर्षीय योजनाएं अपनाईं, जिनमें भूमि सुधार, बड़े बांधों और भारी उद्योगों पर जोर था, लेकिन विकास का लाभ आम लोगों तक कैसे पहुंचेगा, इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। मोदी ने गरीबी कम करने के लिए एक प्रभावी और धर्म-निरपेक्ष कल्याणकारी व्यवस्था को नया रूप दिया। इसमें बिचौलियों को हटाकर सीधे लाभ हस्तांतरण, गैस कनेक्शन, नल से जल, आवास सहायता, गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा, जनधन खातों के जरिए वित्तीय समावेशन, मातृत्व सहायता, स्वच्छता अभियान और महिलाओं के लिए अलग शौचालय जैसी अनेक योजनाएं शामिल हैं।
कोविड-19 के दौरान मोदी ने 'पूरी सरकार के समन्वित दृष्टिकोण' और सही समय पर लगाए गए लॉकडाउन के जरिए देश को गंभीर संकट से उबारा। नेहरू एक वैचारिक और सैद्धांतिक चिंतक थे, जबकि मोदी एक कुशल प्रशासक हैं।
सभ्यतागत चेतना जगा रहे मोदी
खुद को नास्तिक मानने वाले नेहरू ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को नवनिर्मित सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा में शामिल होने से रोकने की पूरी कोशिश की। उन्होंने इस अवसर पर राष्ट्रपति के भाषण का प्रसारण न करने के लिए ऑल इंडिया रेडियो को भी निर्देश दिया। इसके विपरीत, मोदी ने अनेक सांस्कृतिक परियोजनाओं के माध्यम से भारत की सभ्यतागत चेतना के पुनर्जागरण को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया। न परिवार, न दोस्त। न छुट्टियां, न अवकाश। रोज कम से कम 16 घंटे काम। मोदी पिछले 25 वर्षों से बिना रुके, साल के 365 दिन राष्ट्रसेवा में जुटे हुए हैं। इससे पहले 30 वर्षों तक वह पूर्णकालिक संघ प्रचारक और BJP कार्यकर्ता रहे। यानी कुल मिलाकर 55 वर्षों का सार्वजनिक जीवन। उनमें न थकान दिखाई देती है और न ही काम की गति में कोई कमी। मोदी कहते हैं कि उनकी कार्यशैली ही उन्हें हर पल ऊर्जा देती है। वह उस दिव्य शक्ति के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, जिससे उन्हें हर क्षण नवीनता, ताजगी और ऊर्जा की 'अविरत धारा' का अनुभव होता है। मोदी दुनिया के सबसे मेहनती नेताओं में से हैं। वह हर काम में सीधे तौर पर जुड़ते हैं और हर क्षेत्र की छोटी से छोटी जानकारी पर पकड़ रखते हैं। अलग-अलग विषयों के बीच सहजता से काम करने की उनकी क्षमता अद्भुत है। जैसा कि वह स्वयं कहते हैं, 'अनुशासन मेरे डीएनए में है।'
सत्ता हासिल करना लक्ष्य नहीं
गांधीजी ने कांग्रेस की 15 प्रांतीय समितियों में से 12 द्वारा सरदार पटेल के पक्ष में दिए गए समर्थन को दरकिनार करते हुए नेहरू का समर्थन किया, जबकि बाकी 3 समितियां तटस्थ रहीं। बाद में नेहरू ने भारत के पहले बड़े राजनीतिक वंश की नींव रखी और इंदिरा गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाने की दिशा में काम किया।
नरेंद्र मोदी ने BJP के लिए कई चुनाव जिताए, लेकिन स्वयं कोई निर्वाचित पद नहीं मांगा। 51 वर्ष की उम्र में पार्टी के कहने पर उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली। मोदी को अधिकांश नेताओं से अलग करने वाली बात उनके उद्देश्य की स्पष्टता है। उनका लक्ष्य कभी केवल सत्ता हासिल करना नहीं रहा। गांधीजी की तरह सेवा और त्याग उनके लिए सिर्फ शब्द नहीं, जीवन का उद्देश्य है। आने वाले दशकों में नरेंद्र मोदी एक प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित होंगे। भविष्य के प्रधानमंत्री, चाहे किसी भी दल के हों, वे नरेंद्र मोदी की कार्यशैली और नेतृत्व से प्रेरणा लेने की कोशिश करेंगे। आने वाले समय में हर प्रधानमंत्री का मूल्यांकन नरेंद्र मोदी द्वारा स्थापित मानकों के आधार पर किया जाएगा।
(देसाई 'मोदी का मिशन' पुस्तक के लेखक हैं)

