क़ुसूर डांसिंग गर्ल नहीं, समाज की सोच का

नवभारतटाइम्स.कॉम
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कलाकार शकीबुल इस्लाम साल की शुरुआत में आंध्र प्रदेश के लेपाक्षी मंदिर गए थे। उन्हें ताज्जुब हुआ कि 16वीं सदी के इस मंदिर में पुरुष और महिला मूर्तियों के प्राइवेट पार्ट्स को कपड़ों से ढक कर उन पर कीलें ठोंक दी गई हैं। वहां मौजूद सुरक्षा कर्मी ने बताया कि ऐसा स्थानीय लोगों ने किया है ताकि बच्चों पर बुरा असर न पड़े।

बहस शुरू । इससे परेशान शकीबुल ने 4,500 साल पुरानी मोहनजोदड़ो की प्रसिद्ध डांसिंग गर्ल मूर्ति का ऐसा चित्र बनाया, जिसमें उसके शरीर पर सफेद पट्टी लपेट दी गई थी। यह एक कटाक्ष था, लेकिन कुछ समय बाद NCERT की किताब में भी कपड़े से ढकी इसी मूर्ति को छाप दिया गया। कारण भी वही कि इससे बच्चों पर बुरा असर न पड़े। शिक्षाविद् और इतिहासकार मिशेल डैनिनो ने इसकी खूब आलोचना की। बाद में इसे वापस ले लिया गया, पर कला और अश्लीलता को लेकर बहस एक बार फिर शुरू हो गई।
विवादों से नाता । डांसिंग गर्ल पर शुरू से विवाद रहा है। करीब 30 बरस पहले BJP ने दिल्ली पर्यटन के ब्रोशर पर इसे शामिल करने पर आपत्ति जताई थी। खास बात है कि डांसिंग गर्ल नाम क्यों पड़ा, इसकी जानकारी हमें नहीं है। माइथोलॉजिस्ट देवदत्त पटनायक कहते हैं, ‘ऐसा भी हो सकता है कि यह कोई नर्तकी नहीं, किसी दूसरे पोज में खड़ी महिला हो। लेकिन, हमने तय कर लिया कि यह डांसिंग गर्ल है, ठीक उसी तरह जैसे किसी दाढ़ी वाले को पुजारी मान लेते हैं।’

हिकलिन टेस्ट । 1868 में रेजिना बनाम हिकलिन मुकदमे में हुए हिकलिन टेस्ट में कहा गया कि अगर किसी रचना के किसी हिस्से से नैतिकता बिगड़ने का खतरा हो तो उस पर रोक लगाई जा सकती है। 1933 में अमेरिका ने यह मानदंड बदल दिया और कहा कि रचना का मूल्य पूरे संदर्भ और आम आदमी पर असर के आधार पर होना चाहिए।

अश्लीलता की परिभाषा । भारत की अदालतों ने 1964 में हिकलिन टेस्ट का इस्तेमाल किया, लेकिन बाद में सामुदायिक मानकों को आधार बना लिया। इसलिए, 2014 में बोरिस बेकर की न्यूड तस्वीर को पत्रकारिता का हिस्सा माना गया। लेकिन, यूट्यूबर रणवीर इलाहाबादिया के खिलाफ मुकदमे ने बताया कि अश्लीलता की परिभाषा बदलती रहती है।

दोहरा चरित्र । हम अक्सर बच्चों की सुरक्षा का हवाला देते हैं, लेकिन शायद यह हमारी असहजता छिपाने का तरीका है। हम ऐसे समाज में रह रहे हैं, जहां योग करती महिलाओं की पेंटिंग पर लोगों की हरकतों के कारण सफेद रंग पोतना पड़ता है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के 80वें जन्मदिन पर वाइट हाउस में आयोजित केज फाइट जैसे भड़कीले आयोजन की आलोचना हुई। इससे सवाल उठता है कि समाज नग्नता छिपाने में जल्दबाजी करता है, लेकिन हिंसा, भद्देपन और दिखावे को स्वीकार करता है।