कब सुधरेंगे?

नवभारतटाइम्स.कॉम
कब सुधरेंगे?
इसी महीने की शुरुआत में दिल्ली के एक होटल और उसके बाद बिहार के मुजफ्फरपुर के एक हॉस्पिटल में लगी आग में कई मौतों के बाद जब शासन-प्रशासन स्तर पर सख्ती दिखाई गई, तो लगा कि शायद पिछली गलतियों को सुधार लिया जाएगा। लेकिन, लखनऊ में हुए हादसे से साफ है कि जिम्मेदारों की नींद बहुत थोड़े वक्त के लिए खुलती है और फिर सब पहले जैसा हो जाता है। एक इमारत में लगी आग में कई बच्चों की मौत सिस्टम की उन कमियों का नतीजा है, जो सुधरने का नाम नहीं ले रहीं।

दिल्ली जैसा सीन । इस तीन मंजिला इमारत में लाइब्रेरी और एनिमेशन सेंटर चल रहे थे। एसी का कंप्रेसर फटने से आग लगी और थोड़े ही समय में पूरी बिल्डिंग में फैल गई। कई स्टूडेंट्स को बचने का मौका ही नहीं मिला। कुछ दिनों पहले देश ने देखा कि दिल्ली में लोग होटल से कूदकर जान बचा रहे थे और अब वही सीन लखनऊ में दोहराया गया। शुरुआती नजर में ही समझ आता है कि इस बिल्डिंग में आग से बचाव का कोई इंतजाम नहीं था। आने-जाने का एक ही रास्ता था और रिहायशी इलाके में कमर्शल एक्टिविटी चल रही थी।
आंखें बंद । इस दुर्घटना से फिर दो बड़ी कमियां उजागर होती हैं - नियमों की अनदेखी और संसाधनों की कमी। यह सवाल बार-बार उठता है कि कैसे नियम-कायदों को ताक पर रखकर किसी इमारत में होटल, कोचिंग या अस्पताल खुल जाते हैं? और फिर मामला किसी गांव-कस्बे नहीं, यूपी की राजधानी का है। इसका तो यही मतलब निकलेगा कि सिविक संस्थाएं अपना काम ठीक से नहीं कर रहीं या जानबूझकर अनदेखी करती हैं।

संसाधनों की कमी । देश में आग से लड़ने के इंतजाम आबादी के लिहाज से बहुत ही कम हैं। एक ग्लोबल IT सर्विस कंपनी RMSI ने सरकार के निर्देश पर 2012 में एक स्टडी की थी, जिसके मुताबिक देश में करीब 96% फायर स्टेशन और ट्रेंड फायर फाइटर्स की कमी थी। फिर 2021-26 के लिए 15वें वित्त आयोग ने जो रिपोर्ट दी, उसमें भी इस ओर ध्यान दिलाया गया। इस रिपोर्ट के अनुसार, फायर कर्मियों की 96% और फायर स्टेशन की करीब 97% कमी थी। यानी, सुधार नहीं हो रहा।

जिम्मेदारी तय हो । देश के शहरों में आबादी की जरूरत के हिसाब से इंफ्रास्ट्रक्चर खड़े हो रहे हैं, लेकिन जरूरत यह देखने की भी है कि इनमें मानकों का पालन किया जाए। यह जिम्मेदारी सिविक बॉडीज की है। हर हादसे के बाद जांच शुरू हो जाती है और कमोबेश नतीजा एक जैसा निकलता है, पर इससे हादसे रुकते नहीं। जब तक जवाबदेही तय करके जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की जाती, कोई उम्मीद भी मुश्किल है।