परंपरा और मूल्यों में निहित जल संकट का समाधान

Contributed byचेतनादित्य आलोक|नवभारतटाइम्स.कॉम
solution to water crisis the solution lies in traditions and values
हमारी संस्कृति में जल को ईश्वर का रूप माना गया है। ऋषि-मुनियों ने जल को देवता मानकर उसकी पूजा की और सम्मान की परंपरा विकसित की। शास्त्रों में जल को महज प्राकृतिक संसाधन नहीं, दिव्य शक्ति का प्रतीक बताया गया है। वृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है कि जल और वायु परमात्मा के स्वरूप हैं। अध्यात्म उपनिषद् के अनुसार, जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश जैसे पंचमहाभूत परमात्मा के अधीन हैं और वही इनके भीतर रहकर पूरी सृष्टि का संचालन करते हैं। इसलिए भारतीय परंपरा में जल का संरक्षण और सम्मान धार्मिक व नैतिक कर्तव्य माना गया है।

मान्यता है कि वैशाख मास में सभी तीर्थ और देवी-देवता जल में निवास करते हैं, इसलिए इस महीने जलदान का विशेष पुण्य मिलता है। पहले लोग कुओं, तालाबों, बावड़ी और नदियों को भगवान का स्वरूप मानकर उनकी आराधना करते थे। कुएं के पास जूते-चप्पल पहनकर नहीं जाते थे और पानी लेने से पहले प्रणाम करते थे। उन्हें भरोसा था कि ये वरुण देव के प्रतीक हैं। बचपन से ही जल के प्रति श्रद्धा सिखाई जाती थी।
लेकिन, गुजरते समय के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ गई और जल के प्रति सम्मान व संवेदनशीलता भी घटती चली गई। जल की महत्ता बनाए रखने के लिए ऋषि-मुनियों ने जो परंपराएं विकसित की थीं, वे धीरे-धीरे समाप्त होती गईं। अंधाधुंध दोहन, जलाशयों की अनदेखी और उन पर बढ़ते अतिक्रमण के कारण प्राकृतिक जल स्रोत सूख गए। आज हालात इतने गंभीर हैं कि पानी को लेकर हिंसक झड़पें होने लगी हैं। लोग एक-दूसरे की हत्या कर रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का कहना है कि स्वच्छ पेयजल की कमी के कारण हर साल दुनिया में करीब 14 लाख लोगों की मौत हो रही है। वर्ल्ड बैंक ने चेताया है कि वैश्विक सूखे और पानी के अभाव के कारण 2030 तक पूरे विश्व में करीब 7 करोड़ लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ सकता है। इस संकट का समाधान जरूरी है और समाधान उन्हीं पुरानी मान्यताओं-मूल्यों में निहित है, जिसके अनुसार जल देवता हैं।