रोज़ रोडरेज...क्यों बढ़ रहा सड़कों पर गुस्सा?

नवभारतटाइम्स.कॉम
road rage epidemic in gurgaon why is anger escalating on the roads
Akhil.Saxena1

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n गुड़गांव : ओवरटेक तो कभी जाम, आगे निकलने की होड़ तो कभी बेवजह का गुस्सा...कुछ ऐसे ही कारणों से आजकल मिलेनियम सिटी की सड़कें असुरक्षित होती जा रही हैं। आए रोज यहां रोडरेज के मामले सामने आ रहे हैं। जांच के बाद पुलिस आरोपियों को गिरफ्तार करती है, लेकिन बड़ा सवाल है कि सड़क पर आखिर जान क्यों खतरे में पड़ रही है। कभी मामूली सी खरोंच पर गाली-गलौच से शुरू हुआ झगड़ा मारपीट तक पहुंच जाता है तो कभी बेसबॉल बैट से सरेराह किसी को लहूलुहान कर दिया जाता है।

शहर में इन दिनों कई कार सवार हथियार लेकर भी चलने लगे हैं। ऐसे में कभी भी बड़ी घटना हो सकती है। 26 जनवरी शाम के 4:15 बजे। सदर बाजार डाकखाने के पास गाड़ियों के साथ लोगाें की भीड़ थी, तभी एक बाइक का साइड मिरर चमचमाती एसयूवी से टकरा गया। इतनी सी बात पर कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति ने बाइक के सामने अपनी कार अड़ा दी। वह उतरकर कारण पूछने लगे तो कार मालिक बहस करने लगा। कार सवार ने अपनी गाड़ी की पिछली सीट से पिस्टल उठाकर बाइक सवार की छाती पर लगा दी। बाइक सवार ने शोर मचाया तो कार सवार मौके से फरार हो गया।

एक्सप्रेसवे पर गाड़ियां 100 किमी घंटा की रफ्तार से दौड़ती हैं, लेकिन जैसे ही अंदरूनी सड़कों या अचानक लगने वाले जाम में फंसती हैं तो ड्राइवरों का धर्य जवाब दे जाता है। स्टेटस सिंबल और ईगो के कारण टकराव झगड़े को बढ़ावा देता है। महंगी गाड़ियां रखने वाले छोटी गाड़ी या ऑटो आदि को आगे निकलते देखते हैं तो झगड़े पर उतारू हो जाते हैं। गाड़ी चलाते शराब पीने वाले और मोबाइल इस्तेमाल करने वाले भी वारदात को अंजाम देते हैं।

गुड़गांव को वाकई एक ग्लोबल सिटी बनना है तो इसकी पहचान केवल ऊंची इमारतों और मॉल से नहीं, बल्कि इसकी सड़कों पर दिखने वाली समझ से होनी चाहिए। सड़क पर चलते समय यह याद रखना जरूरी है कि किसी बहस को जीतने से ज्यादा जरूरी है सुरक्षित घर पहुंचना। दो मिनट के गुस्से के चक्कर में जेल जाना या किसी की जान लेना समझदारी नहीं है। मैरिंगाे एशिया हाॅस्पिटल के साइकलॉजिस्ट डॉ़ मुनिया भट्टाचार्य के अनुसार, सड़क पर हिंसा करने वाले ज्यादातर लोग स्वभाव से अपराधी नहीं होते, बल्कि वे कॉकपिट इफेक्ट के शिकार होते हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी बड़ी या महंगी गाड़ी के शीशे बंद करके बैठता है तो गाड़ी उसके अहंकार का विस्तार बन जाती है। उसे लगता है कि वह इस बंद केबिन में सुरक्षित है और सड़क पर बाकी लोग उससे कमतर हैं। ऐसे में गाड़ी पर लगा एक छोटा सा स्क्रैच भी उसे अपनी पर्सनल स्पेस और सोशल स्टेटस पर हमला लगता है। यह झूठी ताकत ही उसे हिंसक व्यवहार की ओर धकेलती है।