उम्मीद और चुनौतियों से भरा समझौता

नवभारतटाइम्स.कॉम
west asia agreement hopes and challenges for india
पश्चिम एशिया में महीनों तक चले संघर्ष ने न सिर्फ क्षेत्र को तबाह किया, बल्कि दुनियाभर के आम लोगों की जिंदगी पर असर डाला। तेल की कीमतें आसमान छूने लगी थीं, समुद्री मार्ग बंद हो गए। समझौता वार्ता वह उम्मीद है, जो करोड़ों इंसानों के लिए राहत ला सकती है।

महंगाई पर लगाम । भारत के लिए स्विट्जरलैंड में चल रही बातचीत बस एक अंतरराष्ट्रीय खबर नहीं, उसके आर्थिक और रणनीतिक भविष्य का खाका है। पश्चिम एशिया के इस युद्ध ने भारतीय बाजारों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को अनिश्चितता में धकेल दिया था। अमेरिकी ट्रेजरी द्वारा ईरानी कच्चे तेल के निर्यात पर तत्काल प्रतिबंध हटाने की छूट हमारे लिए सबसे बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक राहत है। सस्ता और सुलभ कच्चा तेल भारतीय किसानों के लिए खाद की लागत कम करेगा, परिवहन को सस्ता करेगा और महंगाई पर लगाम कसेगा।
परियोजनाओं पर ध्यान । भारत के लिए महत्वाकांक्षी चाबहार बंदरगाह के विकास को पुनर्जीवित करने का यह सुनहरा मौका है। चाबहार भारत को पाकिस्तान को बाईपास करके मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक सीधी पहुंच देता है। साथ ही यह अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे की भी मुख्य कड़ी है।

कंपनियों के लिए मौका । ईरान के 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण बाजार में भारतीय इंजीनियरिंग, बुनियादी ढांचे और आईटी कंपनियों के लिए असीम संभावनाएं हैं। मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो मध्य पूर्व में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासियों और समुद्री जहाजों पर तैनात हजारों भारतीय नाविकों की सुरक्षा इससे सीधे तौर पर सुनिश्चित होगी, जो युद्ध के दौरान लगातार जान जोखिम में डालकर काम कर रहे थे।

चुनौतियां भी । तमाम संभावनाओं के बीच भारत के सामने खड़ी चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर हैं। स्विट्जरलैंड में तैयार हुआ 60 दिनों की शांति का रोडमैप असल में ऐसी कच्ची मिट्टी की तरह है, जो किसी भी पल एक छोटी-सी कूटनीतिक चूक से बिखर सकता है। बातचीत किसी मोड़ पर विफल होती है, तो पश्चिम एशिया के फिर से सुलग उठने का डर है। और तब युद्ध की तपिश भारत को ज्यादा महसूस होगी।

संतुलन की मुश्किल । इस पूरे परिदृश्य में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती संतुलन साधने की भी है। अमेरिका और इस्राइल के साथ हमारे संबंध रणनीतिक और तकनीकी रूप से बेहद गहरे व बहुआयामी हैं। वहीं, ईरान, रूस और चीन का ऐसा नया भू-राजनीतिक ध्रुव आकार ले रहा है, जिसे भारत पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकता।

विदेश नीति । ईरान इस मौजूदा समझौते को अपनी 'सैन्य और रणनीतिक जीत' के रूप में देख रहा है। उसका यह आत्मविश्वास उसकी कूटनीति में साफ झलकता है। भारतीय विदेश नीति के रणनीतिकारों के सामने सवाल है कि वॉशिंगटन की नाराजगी और यरूशलेम की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाए बिना, तेहरान में अपने दीर्घकालिक आर्थिक व ऊर्जा हितों को कैसे सुरक्षित रखा जाए। यह ऐसा नाजुक संतुलन है, जहां एक भी गलत कदम हमारी वैश्विक साख को प्रभावित कर सकता है।

चीन को जवाब । इस चुनौती को और जटिल बनाता है चीन और पाकिस्तान का उभरता गठजोड़। इस शांति प्रक्रिया में एक मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की अप्रत्याशित और सक्रिय भूमिका, और ईरान के भीतर चीनी निवेश का लगातार बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चिंता का विषय है। नई दिल्ली ने जिस चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे पर बड़ा दांव लगाया है, उस पर पेइचिंग के 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (घेराबंदी की नीति) का साया मंडरा रहा है। भारत को अपनी पूरी राजनयिक ताकत झोंकनी होगी कि चाबहार और उससे जुड़े तमाम व्यापारिक मार्ग चीनी प्रभाव के गलियारे न बनने पाएं।

आयात में विविधता । भारत को अपने रणनीतिक विकल्पों को और मजबूत व व्यावहारिक बनाना होगा। पश्चिम एशिया के इस संकट ने याद दिलाया है कि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता आत्मघाती हो सकती है।

आत्मनिर्भरता । हमें सऊदी अरब, UAE और रूस जैसे पारंपरिक व वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के साथ अपने समीकरणों को और सुदृढ़ करना होगा। घरेलू स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन की रफ्तार को इतनी गति देनी होगी कि पश्चिम एशिया की किसी भी राजनीतिक हलचल या युद्ध की अनिश्चितता का सीधा असर भारत पर न पड़े। सच्ची आत्मनिर्भरता वही है, जो वैश्विक तूफानों में भी देश के भीतर स्थिरता की गारंटी दे सके।

(लेखक DU के दीनदयाल उपाध्याय कॉलेज में असिस्टेंट प्रफेसर हैं)