ये फ़ाक़ामस्त

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fakamasti the power of laughter even in scarcity an engineers philosophy
मेट्रो स्टेशन के पास एक मंदिर है। वहां कुछ भगवान से मांगने आते हैं, कुछ इन भक्तों से। इनमें तमाम ऐसे होते हैं, जिन्हें देखकर आत्मा कांप जाए। न घर, न कपड़े, न रोटी का ठिकाना, बहुतों के तो शरीर भी समूचे नहीं। लेकिन, ये आपस में जमकर हंसी ठिठोली करते हैं।

इतने अभाव में भी यह हंसी ठिठोली आती कहां से है? इंजीनियर साहब से यही पूछ बैठा। वह बोले, 'आपने सुना है न भगवान जब एक अंग छीनता है तो दूसरा ज्यादा मजबूत कर देता है। उसने इन लोगों को अभाव दिया तो साथ ही ये हंसी और चुहल का भाव दे दिया। आपको ये फूहड़, बदतमीज, मुंहजोर लगते होंगे। लेकिन, यही इनकी ताकत है, जिसके दम पर ये बेरहम जिंदगी का मुकाबला करते हैं। हंसता वही है, जिसके पास अभाव है। वह कभी किस्मत, कभी दुनिया बनाने वाले और कभी खुद की बेबसी पर हंसता है।'
फिर बोले, 'नहीं समझे? आपने कभी किसी संपन्न व्यक्ति का ऐसा सेंस ऑफ ह्यूमर देखा है? वो हंसते हैं पर दूसरों को नीचा दिखाने को। असली हंसी तो फाकाकशी करने वालों की फाकामस्ती है, कि देखो हम अब भी जिंदा हैं।' जब से इंजीनियर साहब गांव में दो महीने गुजार कर आए हैं, फिलॉसफर हो गए। पर अचानक पुराने अंदाज में बोले, 'बचपन में हमारे यहां एक हलवाहा था। मोटे अनाज की रोटी, प्याज मिर्च की चटनी और मट्ठा, यही उसका भोजन था। लेकिन, ताकत बैलों वाली। एक दिन गांव में डिप्टी साब आए, उन्हें नदी पार दूसरे गांव जाना था। हलवाहे को लगा कचहरी वाले अफसर हैं। उसने उनको कंधे पर बैठाया और नदी पार करने लगा। बीच धार में उसने पूछा- कौन-सी कचहरी में बैठते हैं? साहब बोले- अरे, शिक्षा विभाग का डिप्टी हूं, स्कूल का इंस्पेक्शन करने आया हूं। हलवाहे ने डिप्टी साहब को बीच नदी में फेंक दिया और किनारे आकर चपरासी से कहा- बे धरे तुम्हाए डिप्टी साब।' कहानी सुना कर इंजीनियर साहब हंसने लगे। मैंने सोचा, शुक्र है कि अभी पूरे फिलॉसफर नहीं बने।