हेमंत राजौरा
नवीन पटनायक के नेतृत्व में बीजू जनता दल ( BJD ) लंबे समय तक ओडिशा की राजनीति में स्थिरता और मजबूत पकड़ का प्रतीक रहा, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इस छवि पर सवाल खड़े कर दिए हैं। संकेत मिल रहा है कि पार्टी के लिए चुनौतियां गहरा रही हैं और कैडर में कहीं न कहीं भविष्य को लेकर अनिश्चय की स्थिति है।
पार्टी को लगे दोहरे झटके
राज्यसभा चुनाव में पार्टी के कुछ विधायकों द्वारा नेतृत्व की लाइन से अलग जाना सामान्य राजनीतिक असहमति भर नहीं है। यह आंतरिक अनुशासन में ढील का संकेत है। नवीन पटनायक को अब तक सख्त और निर्णायक नेता के रूप में जाना जाता रहा है, उनके लिए यह असहज स्थिति है। इसी के साथ, हाल के उपचुनावों में BJD का तीसरे स्थान पर खिसक जाना बड़ा राजनीतिक झटका है। यह तब है, जब पटनायक ने खुद चुनाव प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता अब पहले जैसी नहीं रही?
राज्य में BJP तेजी से पकड़ मजबूत कर चुकी है। BJP का संगठनात्मक विस्तार और उसकी आक्रामक चुनावी रणनीति BJD के लिए सीधी चुनौती है। वहीं, कांग्रेस भी BJD की कमजोर होती स्थिति को अवसर के रूप में देख रही है और अपनी जमीन फिर से मजबूत करने की कोशिश में है। ऐसे में नवीन पटनायक की पार्टी को दोहरे मोर्चे पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
उत्तराधिकार का सवाल
बाहरी चुनौतियां तो हैं ही, पर इससे ज्यादा गंभीर संकट है नेतृत्व के उत्तराधिकार पर लगा प्रश्नचिह्न। 79 वर्षीय पटनायक अब भी पार्टी का एकमात्र चेहरा हैं। उन्होंने दूसरी पंक्ति का कोई ऐसा नेता तैयार नहीं किया है, जो जनता, कार्यकर्ताओं और संगठन के भीतर भरोसा पैदा कर सके। अन्य क्षेत्रीय दलों से तुलना करें तो अंतर साफ दिखाई देता है। ममता बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी को प्रमुख भूमिका में स्थापित किया है। एमके स्टालिन ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम में नेतृत्व संभालते हुए पार्टी को मजबूत किया, जबकि अखिलेश यादव ने सपा को नई दिशा दी। स्पष्ट है कि समय रहते नेतृत्व परिवर्तन या उत्तराधिकारी तैयार करना राजनीतिक स्थिरता के लिए कितना जरूरी है।
पटनायक के सामने चुनौती यह भी है कि उनके परिवार का कोई सदस्य राजनीति में नहीं है। उन्हें पार्टी के भीतर से ही किसी को उभारना होगा। उनके करीबी नेताओं का मानना है कि यदि पटनायक किसी चेहरे को स्पष्ट रूप से आगे बढ़ाते हैं तो संगठन और कार्यकर्ता उसे स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया जल्दी शुरू होनी चाहिए।
क्या होगा आगे का रास्ता
BJD के पुराने नेता मानते है कि अब अस्तित्व की बात है। पार्टी के भीतर अनुशासन और संवाद को मजबूत करना होगा, ताकि विधायकों और नेताओं के बीच असंतोष को नियंत्रित किया जा सके। दूसरा, संगठन को जमीनी स्तर पर फिर से सक्रिय करना होगा। और तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कदम है, उत्तराधिकारी या नेतृत्व की दूसरी पंक्ति तैयार करना।
BJD इस समय मेक या ब्रेक मोड़ पर खड़ी है। पटनायक के पास अब भी अनुभव, छवि और संगठनात्मक ढांचा है, लेकिन समय तेजी से बदल रहा है। अगर उन्होंने वक्त रहते रणनीतिक बदलाव नहीं किए, तो पार्टी की पकड़ और कमजोर हो सकती है।



