हमारे धर्म शास्त्रों और ग्रंथों में मर्यादाओं का पालन करना प्रत्येक मनुष्य के सुखी व शांतिपूर्ण जीवन के लिए आवश्यक बताया गया है। भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में धर्म, समाज और आचरण से जुड़ी मर्यादाओं का पालन किया। रामनवमी उनके जन्मोत्सव का दिन है, जो हमें इन मर्यादाओं को याद करने और जीवन में उन्हें उतारने की प्रेरणा देता है। आम इंसान भी अपने जीवन से जुड़ी मर्यादाओं का पालन कर श्रेष्ठता का सौभाग्य और सम्मान पा सकता है। इसकी प्रेरणा हमें भगवान राम के जीवन से मिलती है।
हमारी दसों इंद्रियों से जुड़ी मर्यादाओं पर नियंत्रण मनुष्य को चक्रवर्ती सम्राट ‘दशरथ’ बना सकता है। भगवान सूर्य के रथ में लगे सात घोड़े सात प्रकार की मर्यादाओं को दर्शाते हैं, जिनकी लगाम हाथ में होने पर मनुष्य के व्यक्तित्व का प्रकाश ब्रह्मांड को आलोकित कर सकता है। वहीं मर्यादा का भंग होने पर उसके बुरे परिणाम सामने आए हैं। द्रौपदी ने दुर्योधन की हंसी उड़ाकर रिश्तों की मर्यादा भंग की, जबकि कौरवों ने स्त्री मर्यादा को तोड़ा और इसी से महाभारत हुआ। रावण की बहन सूर्पनखा ने जब अपने आचरण की मर्यादा का उल्लंघन किया तो उसे अपनी नाक कटवानी पड़ी। माता सीता ने वनवास के दौरान लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन किया तो रावण ने उनका हरण किया और परिणति राम-रावण युद्ध तक जा पहुंची। ब्रह्माजी ने भी जब अहंकार और वासना के वशीभूत होकर अपनी मर्यादाएं तोड़ीं, तो अपमानित होना पड़ा। प्राणियों में उनके पूजनीय होने का भाव भी खंडित हो गया। राजा दक्ष ने यज्ञ में माता सती के बिना निमंत्रण पहुंचने पर जामाता भगवान महादेव का अपमान किया तो उन्हें भी परिणाम भुगतना पड़ा। माता सती के अग्निदाह से क्रोधित होकर भगवान महादेव ने रौद्र रूप अपना लिया, जिसका सामना समूचे ब्रह्मांड को करना पड़ा।
भगवान राम की तरह मर्यादा, संयम और शील का अनुसरण करने का संकल्प लें, तो रामनवमी उत्सव मनाने का मतलब निकलेगा। यही व्यक्ति, समाज, देश और दुनिया के हित में होगा।



