घर पर सुबह से चहल-पहल थी। मौजूदा हालात पर मंथन के लिए सुखनंदन ने बुद्धिजीवियों को शाम को चाय पर बुलाया था। चाय की बैठकों की विशेषता यह है कि इसमें चाय छोड़ सारा इंतजाम होता है। खाली सिलिंडर पर सुधर्मा की चिंता सुखनंदन भांप गए थे, इसलिए उन्होंने पहले ही अधिकारियों को ‘सख्त’ कार्रवाई के निर्देश दे दिए। शाम तक एजेंसियों से ज्यादा भरे सिलिंडर घर के गोदाम में थे।
इंतजाम के बाद सुखनंदन ‘ आदर्शवाद के 101 नुस्खे’ पर लेख पूरा करने लगे। पुलकित सुधर्मा ने जयचंद से कहा, ‘परिस्थिति कोई भी हो, आदर्श से समझौता नहीं करते।’ जयचंद ने हामी भरी, ‘समझौता तो दूर, जिस रास्ते पर साहब चलते हैं, आदर्श उस पर पांव रखने तक की हिम्मत नहीं जुटा पाता। साहब जलपथ पर चलते हैं और आदर्श अग्निपथ पर।’ ‘ये आदर्श क्या है?’ पास खड़ी श्रीमती जयचंद ने पूछा, तो जवाब सुखनंदन की तरफ से आया, ‘जूता पहन नंगे पाव रहने के 100 फायदे बताना।’
बैठक प्रारंभ हुई। कारखानों के मालिक से कारखास तक, खदानपति से खानसामा तक, सबने समस्या रखी। लगा कि सूर्य में भी इतना ईंधन नहीं बचा कि उसकी गर्मी से पानी वाष्पीकृत होकर समाधान बरसा पाए। ‘घबराना नहीं है’, सुखनंदन की गंभीर आवाज ने सन्नाटे को चीर दिया। ‘जड़ों की ओर लौटो। मिट्टी से नाता जोड़ो। कभी फेफड़ों की फूंक से भट्ठियां भभक जाती थीं, आज गुब्बारे नहीं फूलते। यह वही देश है, जहां गांधी दांडी तक पैदल जाते थे और आज दंड बैठक के लिए भी लोग कार से जाते हैं। पश्चिम ने हमें केवल समस्या दी, लेकिन आज की आपदा ने उससे निपटने का अवसर दिया है, इसका उपयोग करिए।’
‘पर समाधान?’ बैठक में आवाज फूटी। ‘जनता को बताइए कि समस्या समुद्र है, समाधान उसके पानी से बनने वाला नमक। नमक की खास अहमियत होती है। यह समय उस नमक का कर्ज चुकाने का है। बाकी, इस समाधान के प्रचार-प्रसार के लिए ‘अर्थ’ की ‘व्यवस्था’ हो जाएगी’, सुखनंदन ने बैठक खत्म की।



