केंद्र सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम ( महिला आरक्षण ) के तहत संसद और विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण लागू करने के लिए कानूनों में संशोधन की तैयारी कर चुकी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के विभिन्न दलों के सांसदों के साथ बैठकों से साफ है कि सरकार इसी सत्र में विधेयक पारित कराने के लिए प्रतिबद्ध है। दरअसल, 19 सितंबर 2023 को यह अधिनियम पारित करते समय इसमें जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन और 2029 लोकसभा चुनाव से लागू करने की घोषणा की गई। अब सरकार दोनों कार्य संविधान संशोधन के जरिए करना चाहती है।
पुराना वादा । जनगणना के आंकड़ों में समय लग सकता है, इसलिए सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही नया परिसीमन करने जा रही है। वास्तव में नई जनगणना होने और उसके आंकड़े आने में इतना समय निकल जाएगा कि 2029 के चुनाव तक परिसीमन नहीं हो पाएगा। सरकार ने चूंकि 2029 का वादा किया था, तो इसका रास्ता संविधान संशोधन ही हो सकता है।
आम सहमति । सरकार बजट सत्र में ही विधेयक पारित कराना चाहती है। वैसे तो कोई दल इसके खिलाफ नहीं जा सकता, लेकिन वर्तमान राजनीतिक माहौल में यह आसान भी नहीं है। संविधान संशोधन पारित कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत चाहिए, जो सरकार के पास नहीं है, इसलिए आम सहमति बनाने की कोशिश है।
816 सीटें । दक्षिण के राज्यों ने आशंका जाहिर की थी कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के उपाय किए और आबादी के अनुसार परिसीमन होने पर उनके यहां उत्तर भारत के मुकाबले सीटें कम होंगी। केंद्र ने ऐसा नहीं होने का भरोसा दिया है। हमारे यहां सीटों का निर्धारण और उसका भौगोलिक सीमांकन परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है। संशोधन के जरिए लोकसभा में सदस्यों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो सकती है। इससे संसद में बहुमत का आंकड़ा भी बढ़कर 409 हो जाएगा और महिला के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 273 हो जाएगी।
एक जैसा फॉर्म्युला । इसी सूत्र के आधार पर राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटें बढ़ाने और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की योजना है। यह बढ़ोतरी आनुपातिक हो सकती है। जैसे- उत्तर प्रदेश में 80 की जगह 120 लोकसभा सीटें, बिहार में 40 की जगह 60 और तमिलनाडु में 39 की जगह 58-59 सीटें। इस तरह सीट वृद्धि से महिलाओं को आरक्षण से किसी को समस्या भी नहीं आएगी।
परिसीमन आयोग । परिसीमन का मतलब है संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया। ऐसा इसलिए ताकि जनसंख्या में हुए बदलाव के अनुरूप इन्हें समायोजित किया जा सके। संविधान के अनुच्छेद 82 के अंतर्गत संसद हर जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम पारित करती है। इसके आधार पर राष्ट्रपति परिसीमन आयोग का गठन करते हैं। परिसीमन आयोग के आदेशों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके आदेशों की प्रतियां सदन में रखी जाती हैं, लेकिन उनमें संशोधन की अनुमति नहीं होती।
संशोधन संभव । कई हलकों में सवाल है क्या संविधान संशोधन के जरिए ऐसा किया जा सकता है? इसका उत्तर है, हां। ध्यान रखिए, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों की संख्या में यह वृद्धि पांच दशकों में पहली बार होगी। अब तक 1952, 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोगों का गठन किया जा चुका है।
बदलाव बंद । आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में परिसीमन की वजह से लोकसभा क्षेत्रों की संख्या बढ़ती रही। 1951 की जनगणना के बाद यह 489 से बढ़कर 494, 1961 की जनगणना के बाद 522 और 1971 की जनगणना के बाद 543 तक पहुंच गई। यही संख्या आज तक कायम है। सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण उपायों को बढ़ावा देने के लिए 2001 तक लोकसभा सीटों की संख्या को फ्रीज करने का फैसला किया। बाद में इसे 2026 तक बढ़ा दिया गया।
नेताओं का डर । साल 2002 में गठित परिसीमन आयोग ने 2001 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं को फिर से निर्धारित किया, पर इसका उद्देश्य सीटें बढ़ाना नहीं, निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं को समायोजित करके जनसंख्या के प्रतिनिधित्व को संतुलित करना था। यानी जनसंख्या बढ़ती रही, पर सांसदों की संख्या नहीं बढ़ी। तब भी दक्षिण के राज्यों की चिंता एक बड़ा कारण थी। साथ ही, नेताओं का यह भय भी था कि अगर 33% सीटें महिलाओं के नाम हो गईं, तो उनमें से तमाम चेहरे राजनीति से बाहर हो जाएंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



