आशाजी की सिसकियां

Contributed byशैलेंद्र श्रीवास्तव|नवभारतटाइम्स.कॉम

4 जनवरी 1994 को महान संगीतकार आरडी बर्मन का निधन हो गया। उस दिन आशा भोसले ने आरडी बर्मन के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने फोन पर बात करते हुए सिर्फ सिसकियां भरीं। यह घटना उनके अटूट रिश्ते को दर्शाती है। यह रिश्ता शब्दों से परे था, जो संगीत से भी गहरा था।

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4 जनवरी 1994, भारतीय संगीत जगत का एक ऐसा दिन, जब सुर जैसे ठहर गए थे। उस दिन महान संगीतकार आरडी बर्मन ' पंचम दा ' इस दुनिया को अलविदा कह गए। लेकिन, उस दिन की एक निजी स्मृति आज भी मुझे झकझोर देती है। एक ऐसी स्मृति, जिसमें शब्द नहीं, सिर्फ सिसकियां थीं। तब मैं एक प्रतिष्ठित अखबार के मुंबई ऑफिस में था। हमारा कार्यालय नरीमन पॉइंट पर था, जहां मैं उस दिन लोकल डेस्क पर अपने काम में लगा हुआ था। माहौल सामान्य था, तभी संगीत पर लिखने वाले साथी रविराज प्रणामी ने कहा, 'आप जरा आशा भोसले जी का रिएक्शन ले लीजिए।' मैंने चौंककर पूछा, 'क्या वह बात करेंगी? आज ही तो पंचम दा का निधन हुआ है!' उन्होंने कहा, 'नंबर है, आप कोशिश करके देख लीजिए।'

मैंने फोन मिलाया। उधर से अगले ही पल कॉल उठा ली गई। मैंने धीरे से कहा, 'हैलो, आशाजी बोल रही हैं?' लेकिन जवाब में कोई शब्द नहीं आया… मुझे सुनाई पड़ीं सिर्फ सिसकियां। आशाजी किसी बच्चे की तरह फूट-फूट कर रो रही थीं। इतना गहरा दुख, इतना असहनीय शोक कि शब्द जैसे कहीं खो गए थे। मैंने संभलते हुए कहा, 'हम अखबार से बोल रहे हैं…। हम भी इस दुख को महसूस कर रहे हैं…।' लेकिन, उनकी सिसकियां और तेज हो गईं। मैंने फिर कोशिश की, लेकिन हर बार जवाब में सिर्फ सिसकियां ही सुनाई दीं। आशाजी फोन थामें रहीं, जैसे कोई सहारा तलाश रही हों, पर शब्द उनका साथ छोड़ चुके थे।

जब उनसे कुछ कहते नहीं बना, तो कुछ देर बाद मैंने ही कहा, 'मैं समझ सकता हूं। मैं बाद में बात करता हूं।' और मैंने फोन रख दिया। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि कुछ रिश्ते शब्दों में नहीं बंधते, वे सिर्फ महसूस किए जाते हैं। बाद में खबरों से पता चला कि आशाजी उस दिन पंचम दा का पार्थिव शरीर तक देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थीं। वह उन्हें हमेशा जिंदा, मुस्कुराते और संगीत में डूबे हुए ही देखना चाहती थीं। उनका रिश्ता सिर्फ पेशेवर नहीं था - उसमें प्रेम, सम्मान, रचनात्मकता और गहरे अपनेपन का अटूट बंधन था। पंचम दा के संगीत में आशा भोसले की आवाज आत्मा बनकर बसती थी। तभी तो उनका प्रेम पारंपरिक परिभाषाओं से परे था - आजाद, गहरा और सच्चा। शायद यही कारण था कि पंचम दा के जाने के बाद आशाजी के पास कहने के लिए कुछ नहीं बचा था। जो कहना था, वह सब उनके साथ ही चला गया।

उस दिन का वह फोन कॉल आज भी याद दिलाता है कि संगीत सिर्फ सुरों का मेल नहीं होता। वह दिलों का रिश्ता होता है। जब ऐसा रिश्ता टूटता है, तो उसकी आवाज शब्दों में नहीं, सिसकियों में सुनाई देती है।