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सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात मामले में नाबालिग पीड़िता के अधिकारों को प्राथमिकता दी है। यह फैसला मानवीय गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करता है। वहीं, मजदूर दिवस श्रमिकों के अधिकारों और बेहतर जीवन की मांग को रेखांकित करता है। स्थायी रोजगार और सम्मानजनक जीवन के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की आवश्यकता है।

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1 मई का संपादकीय ‘अधिकार सर्वोपरि’ पढ़ा। गर्भपात को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक महत्वपूर्ण कदम है। नाबालिग पीड़िता के मामले में केवल मेडिकल नियमों के आधार पर निर्णय लेना पर्याप्त नहीं। उसकी मानसिक स्थिति, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत गरिमा भी महत्वपूर्ण हैं। मेरी राय में सुप्रीम कोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। एक ओर उसने कानून (MTP Act) की सीमाओं को समझा, दूसरी ओर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले अधिकारों को प्राथमिकता दी। यह संदेश देता है कि कानून का उद्देश्य केवल नियम लागू करना नहीं, इंसान की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करना भी है। हालांकि, यह भी जरूरी है कि ऐसे मामलों में मेडिकल जोखिमों को हल्के में न लिया जाए। लेकिन, अंतिम निर्णय पीड़िता और उसके परिवार पर छोड़ना अधिक मानवीय और व्यावहारिक लगता है।

श्वेता वाजपेयी, ईमेल से

 रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं

हर साल 1 मई को ‘ मजदूर दिवस ’ के रूप में मनाया जाता है। यह दिन श्रमिकों के अधिकारों, सम्मान और बेहतर जीवन की मांग को याद दिलाता है। वर्षों से मजदूर संगठनों ने उनके हितों की रक्षा के लिए संघर्ष किया है, लेकिन आज भी हालात पूरी तरह संतोषजनक नहीं। जब तक स्थायी और भरोसेमंद रोजगार नहीं मिलेगा, तब तक मजदूरों का शोषण होता रहेगा। सम्मानजनक जीवन के लिए भोजन के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की जरूरत भी पूरी होनी चाहिए। मजदूर दिवस केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए, इसके लिए जरूरी है कि बेरोजगारी के कारणों को तलाशकर रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं।

शकुंतला नेनावा, ईमेल से