संगीत बना सहारा

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जन्म से ही आँखों से लाचार रवींद्र जैन ने संगीत को अपना सहारा बनाया। चार साल की उम्र में हारमोनियम पकड़ने वाले रवींद्र जैन ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय के ब्लाइंड स्कूल और कोलकाता में संगीत की शिक्षा ली। मुंबई आकर उन्होंने रेडियो स्टेशन पर गाने के ऑडिशन दिए। संगीत ही उनकी आँखें और पहचान बन गया।

from darkness to the world of music ravindra jains inspiring journey

जन्म लेने पर बच्चे ने आंखें नहीं खोलीं तो माता-पिता को चिंता हुई। वे उसे लेकर अलीगढ़ के प्रसिद्ध नेत्र चिकित्सक के पास गए। उसने सर्जरी करके बच्चे की आंखें तो खोल दीं, लेकिन उनमें रोशनी नहीं थी। डॉक्टर ने बताया कि बच्चा आजीवन देख नहीं सकेगा। लेकिन, इस बात पर माता-पिता निराश नहीं हुए। उस बच्चे को संगीत में रुचि थी। जब वह केवल चार साल का था, तभी माता-पिता ने उसे हारमोनियम पकड़ा दिया। संगीत की शुरुआती शिक्षा की व्यवस्था घर पर कर दी गई। बच्चे को घर में ही सीखने के लिए उचित वातावरण मिल गया, लेकिन संगीत की दुनिया में जगह बनाने के लिए संघर्ष बाकी था। आगे अलीगढ़ विश्वविद्यालय के ब्लाइंड स्कूल में पढ़ाई कर संगीत की शिक्षा के लिए वह कलकत्ता चला गया और 10 वर्षों तक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद रेडियो स्टेशन पर गाने के लिए ऑडिशन देने लगा। रोजगार के लिए उसने मुंबई का रुख किया, जहां ऐसा जलवा बिखेरा कि संगीत ही उसकी आंखें और पहचान बन गया। वह कोई और नहीं, जाने-माने सं गीतकार और गीतकार रवींद्र जैन थे।