NBT रिपोर्ट, नई दिल्ली : पश्चिम एशिया संकट के चलते ईंधन की कीमतों में उछाल का असर अप्रैल में थोक महंगाई दर पर दिखा। कॉमर्स एंड इंडस्ट्री मिनिस्ट्री ने गुरुवार को बताया कि थोक महंगाई दर 8.3% रही। यह इसका 42 महीनों का ऊंचा स्तर है। मार्च के 3.88% के स्तर से इसमें दोगुने से ज्यादा उछाल आया। पिछले साल अप्रैल में यह 0.85% थी। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, होलसेल इंफ्लेशन में इस बढ़ोतरी का असर आने वाले दिनों में रिटेल इंफ्लेशन में दिखेगा। खुदरा महंगाई दर पहले ही अप्रैल में बढ़कर 3.48% हो गई थी।
क्या रही वजह? : मंत्रालय ने कहा, 'मुख्य रूप से मिनरल ऑयल्स, क्रूड पेट्रोलियम, नैचरल गैस, बेसिक मेटल्स और अन्य गैर-खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने का अप्रैल में इंफ्लेशन बढ़ाने में हाथ रहा।'
क्या रहे अहम फैक्टर? : बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, 'भारतीय अर्थव्यवस्था पर युद्ध का पहला असर होलसेल इंफ्लेशन में दिखा है। युद्ध के पहले 60 डॉलर/बैरल पर रहा कच्चा तेल अप्रैल में 100 डॉलर के ऊपर चला गया था। सरकार के दाम बढ़ाने का असर LPG में रहा। पेट्रोल और डीजल की प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ने से इनमें महंगाई बढ़ी। कच्चे तेल का अंतरराष्ट्रीय भाव अभी 100-120 डॉलर की रेंज में दिख रहा है। इसमें कमी नहीं आई, तो होलसेल इंफ्लेशन आने वाले महीनों में भी ज्यादा रहेगी।'
आगे कहां होगा असर? : केयरएज की चीफ इकनॉमिस्ट रजनी सिन्हा ने कहा, 'होलसेल इंफ्लेशन में तेजी का असर रिटेल इंफ्लेशन पर पड़ सकता है। पश्चिम एशिया में जल्द शांति हो जाए, तो भी इस वित्त वर्ष में क्रूड ऑयल के दाम औसतन 90 डॉलर/बैरल के करीब रह सकते हैं। संघर्ष लंबा खिंचा तो दाम ऊपर रहेंगे। अल निनो की आशंका भी ज्यादा है। इससे फूड इंफ्लेशन बढ़ सकती है। इसे देखते हुए वित्त वर्ष 2027 में होलसेल इंफ्लेशन कम से कम 7.8% रह सकती है।’
रीपो रेट पर क्या होगा? : चीफ इकनॉमिस्ट रजनी सिन्हा ने कहा, ‘RBI पॉलिसी रेट को जस का तस बनाए रख सकता है। इकनॉमिक ग्रोथ से जुड़ी चिंता को देखते हुए लगता नहीं कि RBI वह रीपो रेट बढ़ाएगा।'



