अखिलेश प्रताप सिंह
ईरान और अमेरिका की लड़ाई क्या भारत ने शुरू कराई? जंग से कच्चा तेल उछल गया। दुनियाभर के मुकाबले अपने यहां तो पेट्रोल-डीजल के दाम कम ही बढ़े हैं। पब्लिक पर बोझ न बढ़े, इसलिए सरकार ने एक्साइज ड्यूटी घटाकर राजस्व छोड़ दिया है, जो पूरे साल में 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है। यह मुश्किल वक्त है, सबको समझना चाहिए। कमोबेश यही बातें सरकारी अधिकारियों से लेकर BJP नेताओं तक, सभी कह रहे हैं। लेकिन, विपक्ष के पास अपने तर्क हैं।
28 फरवरी को युद्ध शुरू होने से पहले जो कच्चा तेल 60-70 डॉलर प्रति बैरल था, वह 50% उछल चुका है। सरकारी कंपनियों के लिए विदेशी कच्चे तेल का औसत खरीद मूल्य फरवरी में करीब 69 डॉलर प्रति बैरल था। मार्च में यह 117.09 डॉलर प्रति बैरल हो गया। अप्रैल में 114.48 डॉलर/बैरल रहने के बाद मई में अब तक इसका औसत 107.84 डॉलर/बैरल पर है। LNG की अंतरराष्ट्रीय कीमत 50% से ज्यादा उछली है और LPG का भाव दोगुने से ज्यादा हो चुका है।
कैसे होंगे काम
सरकारी तेल कंपनियों ने 15 मई के बाद 4 बार में पेट्रोल-डीजल के दाम कुल 7.50 रुपये प्रति लीटर बढ़ाए हैं। दाम न बढ़ाने से सरकारी कंपनियों को रोजाना 1000 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा था और अब भी लगभग 600 करोड़ रुपये रोज का नुकसान है। सरकार कह रही है कि हालात ऐसे ही रहे तो 3 महीने में ही सरकारी तेल कंपनियों का सालभर का मुनाफा खत्म हो जाएगा। ये अपने लाभ का एक हिस्सा सरकार को देती हैं, जिससे वह कई काम करती है। लाभ का कुछ हिस्सा तेल-गैस कुओं की खोज और उत्पादन से लेकर पेट्रोल-डीजल व दूसरी चीजें बनाने की क्षमता बढ़ाने में निवेश किया जाता है। मुनाफा ही नहीं रहेगा, तो यह सब कैसे होगा?
बोझ पब्लिक पर क्यों
लेकिन, विपक्ष कह रहा है कि भाव बढ़ाने के लिए 5 राज्यों में चुनाव बीतने इंतजार हो रहा था। जब पिछले साल अप्रैल से फरवरी तक कच्चा तेल 60-70 डॉलर प्रति बैरल था, तब पेट्रोल-डीजल सस्ता क्यों नहीं किया? क्रूड सस्ता था, तो मुनाफा कंपनियों ने लिया। वित्त वर्ष 2025-26 में सरकारी तेल कंपनियों का लाभ इसके पिछले साल से 130% बढ़कर 77,280 करोड़ रुपये रहा। केंद्र सरकार ने तेल-गैस सेक्टर से 2024-25 में 4,24,398 करोड़ रुपये कमाए। 2025-26 में भी दिसंबर तक 3,24,388 करोड़ रुपये उसे मिले। अब कच्चा तेल चढ़ा है, तो उसका बोझ पब्लिक पर क्यों? विपक्ष कह रहा है कि रुपया पहले से गिर रहा था, विदेशी निवेशकों का भरोसा हिला हुआ था, विदेशी मुद्रा भंडार पहले से घट रहा था और अब सरकार पल्ला झाड़कर युद्ध से बने हालात की आड़ ले रही है।
बढ़ेगी महंगाई की मार
इस बीच, पश्चिम एशिया में जल्द शांति न हुई तो क्रूड में गर्मी बढ़ सकती है क्योंकि चीन में ज्यादा दाम के बीच खपत घटने से सरकारी कंपनियों ने आयात घटाया था, लेकिन अब वहां क्रूड भंडार कम होने के साथ वे इंपोर्ट बढ़ा सकती हैं। ऐसा हुआ तो भारत में महंगाई और बढ़ेगी। अभी ढुलाई भाड़े से लेकर कंपनियों की उत्पादन लागत तक में ईंधन के ऊंचे दाम का पूरा असर आना बाकी है। ज्यादा भाव के बीच उर्वरकों की तंगी भी हुई, तो फसलें प्रभावित होंगी। ऐसे में रिजर्व बैंक को कर्ज महंगा करना पड़ सकता है। इसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाए, जनहित में जनता को यही समझाने की जंग सरकार और विपक्ष में चल रही है।





