देशवासियों के प्रति गहरे प्रेम और कृतज्ञता से भरे ये शब्द उस महान नेता की वसीयत के हैं, जिसे उन्होंने 21 जून 1954 को लिखा था। वह थे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू। उन्होंने लिखा था, ‘देश के लोगों से मुझे बहुत प्यार मिला है। इस प्यार के बदले मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ नहीं। मेरी यही कामना है कि जब तक जीवित रहूं, उनके प्यार के योग्य बना रहूं।’ उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा भी अत्यंत सरल और भावुक शब्दों में व्यक्त की थी। यदि मृत्यु विदेश में हो तो वहीं अंतिम संस्कार किया जाए, लेकिन राख भारत लाई जाए। राख का एक अंश इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में गंगा में प्रवाहित किया जाए और शेष देश के उन खेतों की मिट्टी में मिला दिया जाए, जहां किसान अपना पसीना बहाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि मरणोपरांत कोई धार्मिक आयोजन न किया जाए। गंगा से उनके विशेष लगाव का कारण था कि उसी के तट पर उन्होंने जीवन पाया और बचपन से उसका स्नेह उनके मन में गहराता गया। आज ही के दिन 1964 में जब उनका निधन हुआ और बाद में उनकी बहन ने यह वसीयत सार्वजनिक रूप से पढ़कर सुनाई, तो पूरा देश भावुक हो उठा।





