स्पेन की धधक

नवभारतटाइम्स.कॉम•
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स्पेन की राजधानी मैड्रिड में रहने वाली 87 साल की बुजुर्ग महिला मारिया अब इस दुनिया में नहीं हैं। अस्पताल में एक पखवाड़े तक संघर्ष के बाद उन्होंने दम तोड़ दिया। लेकिन, जाते हुए भी वह उस लड़ाई को और धार दे गईं, जो उन्हीं से शुरू हुई थी। मारिया की कहानी मुझे अपने पड़ोस की लगती है। उन्होंने एक छोटे से अपार्टमेंट में जिंदगी के 70 साल किराये पर गुजारे। लेकिन फिर 23 सितंबर की सुबह सबकुछ बदल गया। वीलचेयर पर बैठी मारिया को स्ट्रेचर पर लिटाकर घर से बाहर निकाल दिया गया। उनके अपार्टमेंट को रियल एस्टेट कंपनी महंगे दाम पर किसी और को किराये पर देना चाहती थी। अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए इस बुजुर्ग महिला ने एक विडियो संदेश जारी किया। इसमें उन्होंने रोते हुए कहा था, मैं अपने घर को तो नहीं बचा सकी, लेकिन मैं लड़ी ताकि बाकी लोग अपने हक के लिए लड़ना सीखें। बस, मारिया का यही दर्द और टीवी पर आई उनकी बेबसी की तस्वीरों ने पूरे स्पेन में गुस्से की आग लगा दी। देखते ही देखते मैड्रिड का सबसे मशहूर चौराहा एक आंदोलन का मैदान बन गया। प्रदर्शनकारियों ने वहां तंबू गाड़ दिए और कसम खाई कि जब तक किरायेदारों की सुरक्षा के लिए सरकार कोई पक्का कदम नहीं उठाती, वे यहां से एक इंच भी नहीं हिलेंगे। पूरे देश में नारे गूंजने लगे, अब और कोई मारिया नहीं। दरअसल, स्पेन में पिछले 10 बरसों में मकानों का किराया लगभग दोगुना हो चुका है। यहां की एक बड़ी आबादी अपनी कमाई का 40% हिस्सा सिर्फ किराये और बिजली-पानी के बिल में फूंक देती है। सबसे बुरी हालत युवाओं की है, जो नया घर खरीद नहीं सकते। किराये पर मिलने वाले घर बहुत कम और महंगे हैं। लोग इसके लिए टूरिस्ट कंपनियों और प्रॉपर्टी के सट्टेबाजों को जिम्मेदार मान रहे हैं। अगले साल ही स्पेन में आम चुनाव होने थे, इसलिए प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज की सरकार तुरंत एक्शन में आई। उन्होंने आनन-फानन में एक कानून बनाया ताकि लोगों को घरों से निकालने पर रोक लगाई जा सके और किरायेदारों को लंबे समय की सुरक्षा मिले। लेकिन, कहानी में ट्विस्ट तब आया जब संसद में इस कानून को खारिज कर दिया गया। अब सांचेज इस मुद्दे पर जनता की सहानुभूति बटोरने के लिए देश में समय से पहले चुनाव कराने जा रहे हैं। रहने के लिए घर की समस्या सिर्फ स्पेन की नहीं है। आयरलैंड के 2024 के चुनावों से लेकर बर्लिन के हालिया मेयर चुनावों तक, यह मुद्दा पूरे यूरोप में छाया हुआ है। खासकर युवा वोटर इस बात से बेहद नाराज और परेशान हैं, क्योंकि उनकी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ घर का किराया देने में चला जाता है। भारत में भी किरायेदारों की मुश्किल कम नहीं है, लेकिन अभी हम सोच भी नहीं पा रहे होंगे कि यह मुश्किल चुनावी मुद्दा बनने का माद्दा रख सकती है। हमारी पीढ़ी इसकी जमीन तैयार कर रही है। भारत के बड़े महानगरों में रहने वाले नौकरीपेशा युवाओं की कमाई का 50% तक का हिस्सा सिर्फ घर के किराये या ईएमआई चुकाने में चला जाता है। रियल एस्टेट बाजार में अब किफायती या सस्ते घर बनने लगभग बंद हो गए हैं। डिवेलपर्स का पूरा ध्यान एक करोड़ रुपये से ऊपर के लग्जरी होम्स बनाने पर है। ऐसे में मध्यम वर्ग और युवाओं के पास जीवनभर किराये के मकानों में रहने के अलावा कोई रास्ता नहीं बच रहा है। मनमाने ढंग से किराया बढ़ाना या बिना ठोस वजह के अचानक घर खाली करा लेना बेहद आम है, जिससे किरायेदार हमेशा असुरक्षित महसूस करते हैं। स्पेन या बर्लिन की तरह भारत में राजनीतिक पार्टियां मुफ्त की रेवड़ियों को तो चुनावी मुद्दा बनाती हैं, लेकिन किराये के संकट पर किसी का ध्यान नहीं जाता। इसका मुख्य कारण यह है कि शहरों में किराये पर रहने वाली एक बड़ी आबादी प्रवासी होती है, जो वोट डालने अपने पैतृक गांव या राज्यों में चली जाती है। नतीजतन, वे शहरों में एक मजबूत वोट बैंक नहीं बन पाते। सरकार चाहे तो अपनी जमीन पर रेंटल इकॉनमी को बढ़ावा देकर स्पेन जैसी हालत से बचा सकती है।