Internship To Employment Pmis Schemes Two Years Hopes And Challenges
इंटर्नशिप से रोज़गार तक बने राह
नवभारतटाइम्स.कॉम•
प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना (PMIS) के दो बरस पूरे हो गए हैं। इससे इतना तो पता चल गया कि कंपनी जगत में जगह बनाने के लिए भारतीय युवा उत्साहित हैं। केंद्रीय बजट 2024-25 में इस योजना की घोषणा की गई थी और कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय ने उसी साल 3 अक्टूबर को इसकी शुरुआत की। इसका उद्देश्य अगले पांच बरसों में देश की शीर्ष 500 कंपनियों में एक करोड़ इंटर्नशिप के अवसर उपलब्ध कराना है।
शुरुआती बढ़त । योजना के शुरुआती रुझान काफी उत्साहजनक रहे। पहले दिन ही 111 कंपनियों ने रजिस्ट्रेशन कराया। पहले चरण में कंपनियों ने 1.27 लाख से ज्यादा युवाओं को इंटर्नशिप का ऑफर दिया। इनके लिए करीब 1.81 लाख अभ्यर्थियों ने 6.21 लाख से अधिक आवेदन किए। जनवरी 2025 में शुरू हुए दूसरे चरण में योजना 735 जिलों तक पहुंची। फिर, तीसरे चरण में 1.54 लाख से अधिक युवाओं को इंटर्नशिप की पेशकश की गई। कंपनियों ने कुल मिलाकर अब तक इंटर्नशिप के 1.57 लाख से अधिक मौके दिए। योजना में हिस्सा लेने वाली कंपनियों की संख्या भी बढ़कर 947 हो गई, जो शुरुआती लक्ष्य 500 से कहीं ज्यादा है।मानदेय बढ़ा । योजना में कई जरूरी बदलाव भी किए गए। इस साल मार्च से अभ्यर्थियों का मासिक मानदेय 5,000 से बढ़ाकर 9,000 रुपये कर दिया गया। इसके अलावा, 6000 रुपये का एकमुश्त अनुदान और बीमा कवर भी दिया गया। कंपनियों के लिए CSR से जुड़ी शर्त भी हटा दी गई। योग्यता के नियम आसान किए गए और सेमीकंडक्टर, रिन्यूएबल एनर्जी व ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर जैसे नए क्षेत्रों को भी योजना के दायरे में लाया गया।
बड़ी कमी । योजना के लक्ष्य बड़े हैं, लेकिन जमीन पर इसके नतीजे उतने उत्साहजनक नहीं। कंपनियों ने भले ही 1.57 लाख से अधिक इंटर्नशिप ऑफर दिए, लेकिन सिर्फ एक तिहाई अभ्यर्थियों ने ही आवेदन स्वीकार किया। पहले चरण में इंटर्नशिप करने वालों की संख्या रही केवल 8,760। दूसरे चरण में तादाद और कम हो गई- 7,308। लेकिन, इस साल अप्रैल में शुरू हुए तीसरे दौर में आंकड़ा बढ़कर 14,620 हो गया है। एक आकलन के मुताबिक, इंटर्नशिप करने वालों में से सिर्फ 16% को ही पूर्णकालिक नौकरी मिल सकी।
घटा बजट । खर्च के आंकड़े देखकर भी चिंता होती है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए बजट घटाकर 526 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो शुरू में 10,831 करोड़ रुपये था। सूचना के अधिकार (RTI) से मिली जानकारी के मुताबिक, इस साल फरवरी तक सिर्फ 87 करोड़ रुपये खर्च किए गए। यह रकम शुरुआती बजट के 1% से भी कम है। योजना में पैसे और मांग, दोनों मौजूद हैं। कमी है तो सिर्फ इंटर्नशिप ऑफर और उसके जरिये नौकरी मिलने के बीच कोई कड़ी नहीं है।
स्टाफिंग कंपनियां जरूरी । स्टाफिंग कंपनियों की भूमिका यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। ये कंपनियां ऑफर मिलने और काम शुरू करने के बीच की दिक्कतें दूर करने में मददगार साबित हो सकती हैं। अभ्यर्थी कभी काम को अपनी योग्यता के अनुरूप नहीं पाते, तो कभी दूसरे शहर में जाने से बचते हैं। ऐसे में वे इंटर्नशिप के ऑफर ठुकरा देते हैं। स्टाफिंग कंपनियां ऐसे अभ्यर्थियों की काउंसिलिंग कर सकती हैं और काम शुरू करने से पहले उनसे बात कर पराये शहर में उनके रहने-खाने के इंतजाम में मदद कर सकती हैं।
पैमाना बदले । कंपनियों को भी इंटर्नशिप का दायरा बढ़ाने पर विचार करना चाहिए। सिर्फ 500 कंपनियां एक करोड़ इंटर्नशिप के मौके नहीं दे सकतीं। स्टाफिंग कंपनियों और MSME को इसमें जोड़ा जा सकता है। योजना का पैमाना सिर्फ ऑफर का आधार नहीं, नौकरी पाने वालों की संख्या होनी चाहिए। स्टाफिंग सेक्टर के पेरोल और EPFO के आंकड़ों से यह पुष्टि करनी चाहिए कि कितनों को नौकरी मिली और उन्होंने कब तक काम किया।
बड़ी चुनौती । इसमें लाइसेंस वाली स्टाफिंग कंपनियों को भागीदार बनाया जा सकता है। वे सही अभ्यर्थियों को जोड़ने और पूरी प्रक्रिया संभालने में मददगार साबित हो सकती हैं। इससे सरकारी धन का उचित इस्तेमाल होगा और युवाओं को नौकरी मिलने की संभावना बढ़ेगी। PMIS ने युवाओं में उम्मीद जगाई है। अब चुनौती एक करोड़ युवाओं को नौकरी के लिए तैयार करने की है।