रावण की आत्महत्या

नवभारतटाइम्स.कॉम•
ravanas suicide a unique depiction of goods victory over evil
सुधर्मा तैयार होकर आईं तो सुखनंदन मुंह लटकाए मिले। तुनक कर बोलीं, ‘रावण वध होना है, तुम्हारा नहीं, चलो!’ ‘अब चलने से क्या फायदा, रावण ने आत्महत्या की घोषणा कर दी है।’ सुखनंदन की आंखें सजल थीं। ‘लेकिन, आप में तो मुर्दे में भी प्राण फूंकने की कला है, रावण ने तो घोषणा ही की है। एक बार समझाकर देखिए’, जयचंद ने बल याद दिलाया।

‘हे दशानन! तुम बुराई के सबसे बड़े प्रतीक हो। फिर यह अनर्थ क्यों?’ रावण-सुखनंदन संवाद प्रारंभ हुआ। ‘यही तो दुख है। सहस्त्राब्दियों की मेहनत कर मैं जिसका ब्रैंड बना, उसके अब हर गली में स्टार्टअप है, फिर मेरा अर्थ ही क्या बचा? यह बेरोजगारी मैं और नहीं सह पाऊंगा’, रावण हताश था। ‘मृत्यु तो तुम्हारी निश्चित ही है, तो इसका स्वरूप क्यों बदलना?’ सुखनंदन ने समझाया। ‘मैंने मृत्यु को इसलिए चुना, क्योंकि उसके दाता राम थे। रावण को भला दशानन कैसे मार सकता है..?’ ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना-निदा फाजली’, जयचंद ने खींसे निपोरते हुए रावण की बात काट दी।
सुखनंदन ने जयचंद को घूरा, फिर रक्तचाप नियंत्रित कर मिशन रावण पर लौटे, ‘रावण! तुम्हें आत्महत्या की नहीं, सलाहकार की जरूरत है, जो तुम्हें सही परिप्रेक्ष्य समझा सके। जिसमें तुम अवगुण देखते हो, वे गुण हैं। अपराध साजिश है, हिंसा सामर्थ्य है, लालच प्रगति है, अहंकार आत्मविश्वास है, दिखावा ब्रैंडिंग है। इनके लिए क्यों पश्चाताप करना?’ रावण का मन बदल गया। दसों सिर एक साथ बोल पड़े, ‘मैं तो व्यवस्था हूं, मेरी आत्महत्या असंभव है।’ सुखनंदन मुस्कुराए, अब तो जलोगे-मरोगे। रावण धधक कर जल उठा। ‘ बुराई पर अच्छाई की जीत का उद्घोष हुआ।’ बुराई मुस्कुराते हुए घर चली गई।