शरद पूर्णिमा की सीख है अपने ज्ञान से उजाला फैलाना

नवभारतटाइम्स.कॉम•
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भारतीय परंपरा में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। यह वर्षा ऋतु की विदाई और शरद ऋतु के आगमन का समय है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे कोजागरी पूर्णिमा , रास पूर्णिमा और शरद पूनम जैसे नामों से जाना जाता है। इससे जुड़ी परंपराएं प्रकृति, समृद्धि और जीवन की पूर्णता का संदेश देती हैं।

कोजागरी शब्द का संबंध संस्कृत के ‘को जागर्ति?’ से माना जाता है। इसका अर्थ है- ‘कौन जाग रहा है?’ लोक मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी जागने वालों को समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। लेकिन, समृद्धि का अर्थ केवल धन-दौलत पाना नहीं। अपने भीतर छिपी खूबियों को पहचानना, उन्हें निखारना और दूसरों के हित में उनका इस्तेमाल करना भी समृद्धि का ही रूप है। इस नजरिये से देखें तो शरद पूर्णिमा हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा देती है।
प्रश्न उठता है कि सूर्य बारह कलाओं का प्रतीक है, तो उससे प्रकाश ग्रहण करने वाला चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण कैसे होता है? यह एक प्रतीकात्मक विचार की ओर संकेत है- पाने वाला सिर्फ ग्रहण नहीं करता, बल्कि उसका विस्तार भी करता है। इससे जीवन के लिए एक सुंदर सीख मिलती है। हमें परिवार, समाज, प्रकृति और अपने अनुभवों से बहुत कुछ मिलता है। उस ज्ञान को समझना, अपनी क्षमता को बढ़ाना और मिले अवसरों का सही इस्तेमाल करना भी जरूरी है। कहते हैं कि अपने से छोटे उम्र का व्यक्ति भी कभी-कभी ज्ञान की बातें बता सकता है, हमें उसे भी आत्मसात करना चाहिए। चंद्रमा जिस तरह सूर्य के प्रकाश को धरती तक पहुंचाता है, उसी तरह मनुष्य भी अपने ज्ञान और अनुभव से दूसरों के जीवन में उजाला भर सकता है।

शरद पूर्णिमा का संबंध श्रीकृष्ण की रासलीला से भी है। रासलीला प्रेम, आनंद और सामूहिकता का प्रतीक मानी जाती है। यह बताती है कि जीवन की खुशी केवल अपने सुख तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार शरद पूर्णिमा हमें सिखाती है कि जीवन की पूर्णता केवल उपलब्धियां हासिल करने में नहीं, बल्कि अपनी खूबियों को निखारने, दूसरों के काम आने और अपने आसपास खुशियां बांटने में है।