Ashok Vajpeyi Young Writers Read Less Write More Politics In Literature And The Meaning Of Wandering
पढ़ते कम और लिखते अधिक हैं युवा लेखक
नवभारतटाइम्स.कॉम•
हिंदी के प्रख्यात शिल्पकार, कवि, आलोचक, अनुवादक, संस्कृतिकर्मी, निबंधकार और भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी रह चुके अशोक वाजपेयी को हाल में श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान मिला है। इस मौके पर उनसे संध्या रानी ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश :
n श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान पाने वाले आप पहले साहित्यकार हैं। क्या इससे आपकी जिम्मेदारी बढ़ गई?पहले यह पुरस्कार युवाओं को दिया जाता था। लेकिन, किन्हीं कारणों से बंद हो गया। श्रीकांत वर्मा और उनकी पत्नी राज्यसभा के सदस्य रहे थे। उनके निधन के बाद उनके बेटे ने श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान ट्रस्ट बनाया और मुझे पहला पुरस्कार दिया। मुझे यह पुरस्कार लेने से मना करना ठीक नहीं लगा, क्योंकि श्रीकांत वर्मा से मेरे घनिष्ठ संबंध रहे हैं। जिम्मेदारी क्या ही बढ़ेगी, हां कुछ लोग नाराज जरूर हो गए।
n क्या साहित्य में राजनीति होने लगी है?
राजनीति हमारे समाज की बहुत बड़ी शक्ति है। इससे पूरा समाज प्रभावित है, इसलिए साहित्य भी अछूता नहीं रह सकता। इन दोनों के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। जब-जब साहित्य ने राजनीति से प्रेरित होकर उसका पिछलग्गू बनने की कोशिश की है, तब-तब राजनीति का कितना भला हुआ, यह तो पता नहीं, लेकिन साहित्य को भारी नुकसान जरूर हुआ है। हम चाहकर भी राजनीति से बच नहीं सकते। जब राजनीति अपनी नैतिकता से विचलित होती है, तब विरोध करना साहित्य का नैतिक कर्तव्य है।
n आपने कहा था कि साहित्य भटकने का परिसर है। क्या कोई मंजिल भी होती है?
साहित्य में भटकने का अर्थ है तरह-तरह की सचाइयों को पहचानना, जिन्हें हम पहले नहीं देख पाते थे, लेकिन साहित्य की प्रक्रिया में उन्हें देख पाते हैं। लेखक के लिए यह जरूरी है कि वह पहले से सब कुछ जानकर न चले। जब तक वह खोज व भटकाव की प्रक्रिया से नहीं गुजरेगा, तब तक किसी नई सचाई से रूबरू नहीं होगा। साहित्य तभी सार्थक होता है, जब लेखक अपनी रचना प्रक्रिया के माध्यम से किसी नए सच तक पहुंचता है। साहित्य की मंजिल तो मनुष्य और जीवन ही है।
n साहित्यकारों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन कई बार ये व्यक्तिगत विवादों में क्यों बदल जाते हैं?
हर क्षेत्र की तरह साहित्य में भी वैचारिक मतभेद होते हैं। लेकिन, वैचारिक मतभेदों को व्यक्तिगत विवादों का जामा पहनाना गलत है। मतभेदों के आधार पर मूल्यांकन करना और किसी को अवसरों व साधनों से वंचित करना अनुचित है।
n आज हर शख्स लक्ष्य हासिल करने की जल्दी में है। क्या साहित्य का यह भटकना हमें ठहरने, सोचने और जीवन की गहराई को देखने का अवसर देता है?
आज अधीरता गति के आकर्षण का नतीजा है। हमारे जमाने में अधीरता थोड़ी कम थी, लेकिन थी। यह खुमार साहित्य के विपरीत है। साहित्य तो थोड़ा ठहरने, थमने और समझने का मुकाम है। यह अधीरता उसकी रचना के रसास्वादन में सहायक नहीं हो सकती। साहित्य एक प्रतिविंदु है। अगर आप जल्दबाजी में हैं, तो साहित्य में आपके लिए कोई जगह नहीं। उसके लिए आपके पास धीरज, समय और फुर्सत होनी चाहिए।
n अपनी कौन-सी रचना सबसे प्रिय है?
यह मैं नहीं बता सकता। मैंने तथाकथित सभी विषयों पर कविताएं लिखी हैं। पिछले दो दशकों से मैंने सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर भी कविताएं लिखी हैं।
n आज के युवा कवियों में आप किसे पढ़ना पसंद करते हैं?
मैं 65 बरसों से युवाओं के लिए काम कर रहा हूं। साहित्य के साथ-साथ कला के लिए भी काम करता रहा हूं। पिछले डेढ़ दशक में कविता के क्षेत्र में बड़ी संख्या में स्त्रियों का आना बड़ी बात है। उन्होंने साहित्य की अनुभव संपदा और भाव संपदा में अमूल्य योगदान दिया है। ऐसा करके उन्होंने हिंदी कविता को अधिक लोकतांत्रिक बना दिया है, लेकिन युवा कवियों में भाषा और शिल्प के प्रति लापरवाही बढ़ी है।
युवा लेखकों को क्या सलाह देंगे?
युवाओं से मेरी शिकायत है कि वे पढ़ते कम और लिखते ज्यादा हैं। वे कोई क्लासिक, भक्ति साहित्य या विदेशी कविता को नहीं पढ़ते। वे एक-दूसरे को ही पढ़ते हैं, जबकि समृद्ध साहित्य वही होता है, जिसमें पुरखे भी बोलते हैं।
n आपके प्रिय कवि कौन हैं? किनकी रचनाओं से आप प्रेरित होते हैं और आपके लेखन में उसकी छाप दिखती है?
जब मैंने लिखना शुरू किया तो अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय जैसे कवि थे, जिनके प्रभाव क्षेत्र में दाखिल होने की कोशिश कर रहा था। बाद में मुझे श्रीकांत वर्मा और विजयदेव नारायण साही ने प्रभावित किया। हिंदी साहित्य के अलावा मैंने विदेशी कवियों को भी पढ़ा। उनमें एलियट, पाब्लो नेरुदा और Herbert आदि से मैंने काफी सीखा है।