Last Salute Of Fireflies Nights Light Fading Due To Human Negligence
जुगनुओं का आख़िरी सलाम
Contributed by: नाइश हसन|नवभारतटाइम्स.कॉम•
मुझे बचपन के वो दिन याद हैं, जब गर्मी अपने आखिरी पड़ाव पर होती थी, बारिश का आगाज लगभग हो चुका होता था, उस वक्त रातें बड़ी रोशन लगतीं। तब घने अंधेरे के सीने पर मुट्ठी भर रोशनी लिए तैरते हुए जुगनू किसी हसीन ख्वाब की तरह लगा करते थे। घर के बाहर बड़ा-सा तालाब था। रात में ऐसा लगता कि उस पर सितारे उतर आए हैं। कभी-कभी हम बच्चे झाड़ियों में जुगनुओं के पीछे भागते और वे उड़कर हमारी हथेली या कमीज पर जगमगाने लगते। अफसोस, आज वह जादुई दुनिया पूरी तरह उजड़ चुकी है। हमारी रातें अब सूनी हैं। मुझे तो लगता है कि नए बच्चों ने जगमगाते जुगनू देखे ही नहीं होंगे!
सचाई बहुत तल्ख और दर्दनाक है। इन मासूम जुगनुओं को किसी कुदरती आफत ने नहीं मिटाया, बल्कि हम इंसानों की बेरुखी, खुदगर्जी और हमारे फैलाए हुए जहरीले माहौल ने धीरे-धीरे उनकी दुनिया उजाड़ डाली। हमने कंक्रीट के बेजान जंगल खड़े करने की अंधी दौड़ में सबसे पहले इन नाजुक परवानों से उनका आशियाना छीन लिया। जहां कभी नम मिट्टी, ऊंची घास और सूखे पत्तों की दिलफरेब महक हुआ करती थी, वहां आज पक्की सड़कें और इमारतें हैं। अपने बागों को चमकाने के लिए हमने जमीन में कीड़ेमार जहर को घोल दिया। इस रासायनिक प्रदूषण ने छोटे घोंघों और केचुओं को भी मार डाला। प्रदूषण की जालिमाना हरकत यहीं नहीं थमी। जुगनुओं को सांस लेने के लिए साफ हवा और अंडे देने के लिए नदियों-तालाबों के किनारे की जमीन चाहिए थी। हमारे शहरों से निकले जहरीले धुएं और पानी ने इन दोनों को तबाह कर दिया।कुदरत ने जुगनुओं को यह मद्धम रोशनी नुमाइश के लिए नहीं, बल्कि नर और मादा के बीच इश्क के इजहार के लिए दी थी। मगर इंसान की बनावटी चकाचौंध, तेज एलईडी लाइट्स और नियोन बोर्ड ने रात के खूबसूरत अंधेरे को मिटा दिया। अब उस उजाले के शोर में जुगनुओं की पुकार एक-दूसरे तक नहीं पहुंच पाती। कुदरत के इस मासूम और आशिक मिजाज हिस्से को हमने अपनी खुदगर्जी की भेंट चढ़ा दिया। आने वाली पीढ़ियां शायद कभी जान भी न पाएं कि अंधेरी रातों में कोई उड़ता तारा भी हुआ करता था, जो अपनी रोशनी से रात का हुस्न मुकम्मल कर देता था। शहरों की चकाचौंध तो जीत गई, लेकिन कुदरत का यह बेमिसाल दोस्त हमेशा के लिए खो गया।
आज घर के बाहर वही पुराना तालाब सूना पड़ा है, जहां कभी जुगनुओं की रोशनी का मेला लगा रहता था। अब वहां कोई जुगनू नजर नहीं आता। उनके असली कातिल हम इंसान ही हैं।