गड्ढों में दबे सवाल

नवभारतटाइम्स.कॉम•
potholes on expressways a question of corruption and negligence when will accountability be ensured
ऐसा कोई दिन नहीं जब किसी सड़क के गड्ढे में समाने की खबर न आए। हज़ारों करोड़ रुपये की लागत से बने दिल्ली-मुंबई, दिल्ली-देहरादून और कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे हाल में इन्हीं वजह से सुर्खियों में रहे। उद्घाटन के चंद दिनों के भीतर ही इनमें कहीं गड्ढे हो गए, सड़क उखड़ गई या सरिये दिखने लगे। अब दिल्ली और नोएडा की एलिवेटेड रोड तो ऐसी उखड़ीं कि इन्हें कई दिनों के लिए बंद ही करना पड़ा। IGI एयरपोर्ट से वसंत विहार जाने वाला तीन किमी लंबा RTR फ्लाईओवर सात साल पहले ही बना है। वहीं, नौ साल पहले 480 करोड़ रु. में बनी सेक्टर 61 से 18 को जोड़ने वाली नोएडा की पांच किमी लंबी एलिवेटेड रोड एक महीने में ही दो बार धंस चुकी है। 15 सितंबर को भी इसमें दस फुट गहरा गड्ढा हो गया था, जिसका कारण अभी तक पता नहीं चल पाया है। अब इस ताज़ा फॉल्ट को ढूंढने का ज़िम्मा IIT रुड़की की टीम को दिया गया है। यह तब है जब दो साल पहले ही इस रोड की सतह पर दरारें आने और परतें उखड़ने पर मरम्मत का काम कराया गया था। गुरुग्राम की सोहना एलिवेटेड रोड और हीरो होंडा चौक फ्लाईओवर भी पिछले कुछ वर्षों में कई बार टूट चुके हैं पर कोई जवाबदेही तय नहीं होती। टैक्सपेयर इन टूटी सड़कों पर हिचकोले खाने को मजबूर है।

दो साल पहले NHAI ने दावा किया था कि अब हाइवे पर गड्ढे, टूटी सड़कें, खराब स्ट्रीट लाइट और अतिक्रमण की एआई बेस्ड डैशकैम से रियल-टाइम निगरानी की जा रही है। ऑटोमैटिक मशीनों से इन गड्ढों और टूट-फूट को तेजी से ठीक किया जाएगा। तुरंत मरम्मत तो दूर की बात, यहां तो हफ्तों के लिए पूरी रोड ही बंद कर दी जा रही। जाम से जूझते दिल्ली एनसीआर के लिए तो यह किसी सज़ा से कम नहीं। स्विट्ज़रलैंड से ही सीख लें, जहां सड़क दुरुस्त करते वक्त ट्रैफिक को बिलकुल डिस्टर्ब नहीं किया जाता। एक टेंपररी मूवेबल ब्रिज बना दिया जाता है ताकि गाड़ियां ऊपर से जा सकें और नीचे सड़क रिपेयरिंग का काम बिना रुकावट होता रहे।
सवाल यह है कि आखिर कहां गईं ये मशीनें जो एआई की मदद से हाइवे की टूट-फूट पकड़ने वाली थीं। इनका कितना इस्तेमाल हुआ आज तक। नए बने हाइवे पर गड्ढे कैसे हो रहे। इन्हें समय रहते क्यों नहीं पकड़ पाई ये तकनीक। हर बार जांच बैठा दी जाती है। रिपोर्ट कब आती है, किसी को पता नहीं। जिन्हें ज़िम्मेदार ठहराया जाता है, उन पर क्या कार्रवाई होती है, कोई नहीं जानता। सवाल तो कई हैं, जवाब भ्रष्ट तंत्र की गहराई में छिपे हैं जो शायद ही कभी मिलें।