ज़िम्मेदारी समझें

नवभारतटाइम्स.कॉम•
minors negligence 21 deaths per hour in road accidents questions on parental responsibility
साल 2025 के डेटा के मुताबिक, देश में हर घंटे औसतन 21 लोगों की जान सड़क हादसों में जाती है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और वर्ल्ड बैंक का आकलन है कि दुनिया में होने वाले कुल रोड एक्सीडेंट में से करीब 11% भारत में होते हैं। दुर्घटनाओं का सिलसिला जिस तरह से बढ़ा है, उसने भारतीय सड़कों को बेहद खतरनाक बना दिया है। इसके पीछे खराब रोड, ट्रैफिक नियमों का पालन न करना, खटारा वाहन जैसी वजहें तो हैं ही, लापरवाही भी बड़ी समस्या है।

आंकड़ों में गंभीरता । नियमों के मुताबिक, 18 साल से कम उम्र के बच्चे सामान्य मोटर वाहन नहीं चला सकते। लेकिन, यह नियम सड़कों पर सबसे ज्यादा टूटता दिखता है। ऐसे अभिभावकों की कमी नहीं, जो अपने बच्चों को दोपहिया या चार पहिया की चाबी थमा देते हैं। आंकड़े बताते हैं कि ऐसा करना कितना गंभीर हो सकता है। साल 2023 और 2024 में नाबालिगों ने कुल 11,890 सड़क हादसे किए, हर दिन औसतन 16। केरल के कोच्चि में हुई दुर्घटना भी इसी लापरवाही का एक और उदाहरण है।
कानून का पालन । आरोप है कि एक नाबालिग ने कार से 55 वर्षीय व्यक्ति को टक्कर मार दी, जिससे उनकी मौत हो गई। घटना ने इसलिए तूल पकड़ा क्योंकि नाबालिग के पिता अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश हैं। केरल हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ केस दर्ज करने की अनुमति दे दी है। मोटर वाहन कानून में नाबालिगों के वाहन चलाने पर अभिभावक या वाहन मालिक की जवाबदेही का प्रावधान है। इसके बावजूद मामले रुक नहीं रहे, क्योंकि कानून का प्रभावी ढंग से पालन नहीं हो पाता। कोच्चि केस में अब पुलिस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जांच और आगे की कार्रवाई बिना किसी दबाव के आगे बढ़े।

दूसरों के लिए जोखिम । वाहन चलाना केवल सुविधा या शौक नहीं, बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। सड़क पर चलते हुए अपने साथ दूसरों की सुरक्षा का ख्याल भी रखना पड़ता है। ड्राइविंग सीख लेना या नियम जान लेना काफी नहीं है। सड़क पर संयम, समझ और अचानक पैदा होने वाली परिस्थितियों से निपटने की क्षमता भी जरूरी है। नाबालिग इन सबके लिए तैयार नहीं होते। उनकी गलतियां उनके लिए तो खतरा पैदा ही करती हैं, दूसरों को भी खामियाजा भुगतना पड़ता है।

जागरूकता और सख्ती । जब तक अभिभावक जागरूक नहीं होंगे, नियमों के सहारे या कानून के डर से समाधान नहीं निकलेगा। स्कूलों को भी इसमें पहल करनी चाहिए। जो नाबालिग बच्चे खुद ड्राइव करके आते हैं, उन्हें जागरूक करने के साथ-साथ उनके परिवार वालों को भी समझाया जाए।