ज़मीन पर कैसे उतरेगा संघ का संदेश

नवभारतटाइम्स.कॉम•
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पूनम पाण्डे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 100 साल हो गए हैं। संघ का पहले सामाजिक समरसता पर ज्यादा फोकस रहता था, वहीं पिछले कुछ बरसों से उसने हर बड़े मंच से सद्भावना की बात कही है। उसका कहना है कि इतिहास में जो हुआ, उससे मन में शंका पैदा होती है, लेकिन सद्भावना और एकता जरूरी है। इसके लिए लगातार काम करने के साथ ही व्यवहार में भी इसे उतारना होगा। सामाजिक समरसता एक तरह से हिंदू समाज के अलग-अलग कथित वर्णों के बीच एकता का संदेश है। जबकि सद्भावना के दायरे में संघ की हिंदू की परिभाषा के अनुसार सभी धर्मों को मानने वाले लोग भी आते हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत कई मौकों पर कह चुके हैं कि भारत में रहने वाले सभी लोग हिंदू हैं, भले ही उनकी पूजा पद्धति अलग-अलग हो।
सभी के लिए अहम बात

मोहन भागवत ने विजयादशमी पर अपने भाषण में इतिहास के संघर्षों से पैदा हुई गांठों, आपसी अविश्वास और छोटी-छोटी बातों पर समाज को उकसाने की कोशिशों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि संदेह दूर करने और नए विवाद पैदा होने से रोकने के लिए सद्भावना व अपनापन जरूरी है। संघ की BJP की राजनीति और देश की वैचारिक बहस में महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में संघ प्रमुख जब समाज में असंतोष बढ़ाने वाली कुछ घटनाओं और व्यवहार में संयम की बात करते हैं तो वह संदेश सभी के लिए माना जा सकता है।

भारत में इतिहास, धर्म और पहचान से जुड़े मुद्दे लंबे समय से राजनीति का हिस्सा रहे हैं। इन पर विभिन्न समुदायों की अपनी धारणाएं हैं और राजनीतिक दल भी इनको अपने नजरिये से उठाते रहे हैं। ऐसे में भागवत की अपील अहम है।

इन सौ बरसों में संघ का विस्तार और सामाजिक प्रभाव, दोनों बढ़े हैं। BJP के सत्ता में आने के बाद संघ की विचारधारा से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रीय राजनीति में पहले से ज्यादा चर्चा होती है। उनके वैचारिक संबंधों के कारण एक के संदेश का असर दूसरे की राजनीति पर भी पड़ता है। संघ प्रमुख के संदेश का क्या असर हुआ, इसका आकलन तब हो पाएगा, जब किसी विवाद के वक्त उससे जुड़े लोगों की प्रतिक्रिया सामने आएगी।

उकसावे की राजनीति से सचेत

भागवत ने शासन-प्रशासन के व्यवहार पर जो बात कही, उसका राजनीतिक महत्व कम नहीं। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि किसी अभियान या नीति को लागू करते समय नागरिकों के सम्मान का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। यह सरकारों और राजनीतिक नेतृत्व के कामकाज से भी जुड़ा सवाल है। किसी नीति को लेकर सरकार का अपना तर्क हो सकता है और उसे लागू करना प्रशासन की जिम्मेदारी भी है। लेकिन व्यवहार भद्र और किसी के लिए अपमानजनक ना हो, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

भागवत ने छोटी-छोटी बातों पर समाज को उकसा कर झगड़ा कराने वालों से दूर रहने की सलाह दी। सोशल मीडिया के दौर में यह चिंता ज्यादा बड़ी हो जाती है। किसी घटना की अधूरी जानकारी, भड़काऊ संदेश या पुराने विवाद से जुड़े विडियो तेजी से फैलते हैं। राजनीतिक दलों के समर्थक भी कई बार इसका हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे में भागवत की संयम की अपील सभी के लिए है।