Trust Between Parliament And Public Will Increase Essential For Protecting The Soul Of Democracy
संसद और जनता में क़रीबी से बढ़ेगा भरोसा
नवभारतटाइम्स.कॉम•
लोकतंत्र संसद भवन की भव्य चारदीवारी और सभागारों तक ही सीमित नहीं, यह ऐसा जज्बा है जो जनता के दिलों में धड़कता है, एक ऐसी ताकत है जो उनकी आवाज को बुलंद करता है, ऐसा दृष्टिकोण है जो उनके रोजमर्रा के आचार-विचार-व्यवहार का मार्गदर्शन करता है। संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, परंतु इसमें प्राण-प्रतिष्ठा तो जनता ही करती है। अगर उसे इस मंदिर से दूर रखा गया, तो यह ईंट-पत्थरों से बनी प्राण-विहीन इमारत बनकर रह जाएगा। इसीलिए संसद को जनता के निकट लाना हमारे लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।
जब भी नागरिकों को ऐसा लगने लगता है कि उनके और विधानमंडलों के बीच दूरी है, तो उनके अंतर्मन में अलगाव की भावना जन्म लेती है। लोग कानूनों को जनता के सरोकारों और जनप्रतिनिधियों की सामूहिक इच्छा से निर्मित विधिक उपायों के बजाय, अपने ऊपर थोपे गए आदेश मानने लगते हैं। यदि नागरिक जागरूक हों, तो उनके भीतर संसदीय संस्थाओं के प्रति निराशा की संभावना कम हो जाती है। संसद और जनता के बीच की दूरी कम होने से नागरिक सक्रिय और जिम्मेदार सहभागी बन जाते हैं।संसदीय जानकारी सुलभ हुई
संसद की कार्यवाही में पारदर्शिता से जनता का भरोसा और जवाबदेही बढ़ती है। वे अपने प्रतिनिधियों के कामकाज पर नजर रख सकते हैं। आज भ्रामक जानकारी और निराशावादी विचारों से सार्वजनिक संस्थाओं पर विश्वास कम हो सकता है, ऐसे में संसद को जनता के निकट लाने से लोकतंत्र पर लोगों का विश्वास बढ़ता है। देश में इसके लिए दशकों से प्रयास चल रहे हैं। संसदीय कार्यवाहियों का प्रसारण महत्वपूर्ण पहल है। 1989 में राष्ट्रपति के अभिभाषण का सीधा प्रसारण हुआ था। 1991 में प्रश्न काल और 1992 में बजट पेश किए जाने का लाइव टेलिकास्ट हुआ। दिसंबर 2004 में दो उपग्रह चैनलों से दोनों सदनों की कार्यवाही पूरे देश में दिखाई गई। विषय आधारित कार्यक्रमों, चर्चाओं और विशेषज्ञों द्वारा विश्लेषण से संसदीय प्रक्रियाओं व मुद्दों को समझने में मदद मिलती है।
भारत की संसद समय के साथ चलते हुए AI का उपयोग कर रही है, ताकि संसदीय जानकारी को अधिक सुलभ बनाया जा सके। दस्तावेजों को संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं में उपलब्ध कराने से भाषा संबंधी बाधाओं को कम करने में भी मदद मिली है। ‘डिजिटल इंडिया’ के व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप इन पहलों से नागरिकों की संसद तक पहुंच बढ़ी है। हालांकि, जनता तक पहुंच बढ़ाने का अर्थ केवल जानकारी का प्रचार-प्रसार करना नहीं। नागरिकों को संसदीय संस्थाओं को समझने और उनके कामकाज से जुड़ने के अवसर भी मिलने चाहिए। 1976 में स्थापित संसदीय लोकतंत्र शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान (PRIDE) छात्रों, विद्वानों, शिक्षाविदों, सरकारी अधिकारियों और अन्य संबंधित लोगों के अध्ययन दौरों व परिचय कार्यक्रमों के माध्यम से इस उद्देश्य को पूरा कर रहा है।
विचार रखने का अवसर
युवाओं को संसद से जोड़ने के लिए राष्ट्रीय युवा संसद महोत्सव, ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’, ‘नो योर मेंबर’ और ‘नो योर पार्लियामेंट- समझ संसद की’ जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इंटर्नशिप और शैक्षणिक पहलों से भी छात्रों व युवा पेशेवरों को संसदीय कामकाज का व्यावहारिक अनुभव मिल रहा है। संसद नागरिकों को लोकतांत्रिक चर्चा में भाग लेने और अपनी राय रखने का अवसर भी देती है। संसदीय समितियां विधायी प्रस्तावों और जनहित के मुद्दों पर जनता की राय मांगती हैं और विशेषज्ञों व अन्य संबंधित पक्षों के विचार सुनती हैं। इससे विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने और समाज की जरूरतों के अनुरूप कानून बनाने में मदद मिलती है।
संसद को जनता के करीब लाने के लिए जानकारी तक पहुंच और जनभागीदारी बढ़ाना जरूरी है। लेकिन, जनता का भरोसा जनप्रतिनिधियों के आचरण पर भी निर्भर करता है। सांसदों को सदन की गरिमा बनाए रखते हुए दूसरों के विचारों का सम्मान करना चाहिए। सार्वजनिक जीवन में भी उनका आचरण ऐसा हो। जनहित के मुद्दों पर गंभीर चर्चा और उनके समाधान का तरीका ही लोकतंत्र में जनता, खासकर युवाओं का विश्वास बढ़ाता है।
सफलता की असली कसौटी
संसद और जनता के बीच संबंधों को और मजबूत बनाने के लिए हमें मिलकर ऐसी लोकतांत्रिक संस्कृति विकसित करनी होगी, जिसका आधार सुगम्यता, जवाबदेही, संवाद व परस्पर सम्मान हो। संसद ऐसी संस्था बनी रहे, जहां नागरिकों के सरोकारों को गंभीरता से सुना जाए, उनकी आकांक्षाओं को उचित स्थान मिले और हमारे गणराज्य का मार्गदर्शन करने वाले संवैधानिक आदर्श हमेशा सर्वोपरि रहें। हमारी सफलता की वास्तविक कसौटी यह है कि नागरिकों की बात को कितना सुना गया, उनका कितना प्रतिनिधित्व है और वे कितना सशक्त महसूस करते हैं। जन-केंद्रित संसद वही है, जिसमें जनता राष्ट्र की नीतियों, प्राथमिकताओं और भविष्य के निर्माण में सक्रिय भागीदार बने।