आपदा में अवसर तलाश सकते हैं बालेन

नवभारतटाइम्स.कॉम
opportunity in disaster the real test of balen shahs leadership
नेपाल में पिछले साल सितंबर में Gen Z आंदोलन के दौरान बदलाव के अगुआ रहे बालेंद्र बालेन शाह इस साल मार्च में वहां के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने। लेकिन, पांच महीने में ही उनकी चमक फीकी पड़ने लगी है। उनकी सरकार के कामकाज में अनुभवहीनता और मनमाने तरीके से फैसले लेने के आरोप लग रहे हैं। इतिहास गवाह है कि आंदोलन से निकली सरकारों के सामने शासन चलाना बड़ी चुनौती रहा है। दशकों पहले पूर्वोत्तर भारत के असम में जब असम गण परिषद (AGP) की पहली बार सरकार बनी थी, तो कमोबेश यही स्थिति देखने को मिली थी।

युवा नेतृत्व । सोशल मीडिया पर बैन लगाने के कारण सितंबर 2025 में नेपाल के युवाओं ने विरोध शुरू किया था। वहां के युवाओं में भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ भारी नाराजगी थी। तब हुई हिंसा में 70 से ज्यादा लोग मारे गए। आंदोलनकारियों ने संसद और सुप्रीम कोर्ट में आग लगा दी और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को 48 घंटे में इस्तीफा देना पड़ा। पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की की अगुआई वाली अंतरिम सरकार ने मार्च में चुनाव कराया। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ने 275 में से 182 सीटें जीतीं और बालेन शाह ने ओली को करीब 50 हजार वोटों से हराया। नेपाल की जनता ने राजनीतिक धुरंधरों को हटाकर युवा नेतृत्व चुना।
परिपक्वता की कमी । हालांकि, इसके बाद भी लोगों की निराशा कम नहीं हुई। बालेन शाह संसद की पहली 39 बैठकों में केवल पांच में ही पहुंचे। आखिरकार स्पीकर को उन्हें सांसदों के सवालों का जवाब देने के लिए बुलाना पड़ा। छुट्टियां मनाने के कारण वह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक से भी गैरहाजिर रहे। नेपाल के भारतीय जमीन पर कब्जे का दावा करने वाले उनके बयान, भारतीय अधिकारियों से मुलाकात नहीं करने के कारण संबंधों पर भी असर पड़ा।

लोकप्रियता धूमिल । इसके बाद भारत ने RSP अध्यक्ष रबी लामिछाने का जोरदार स्वागत किया। इससे पार्टी के भीतर सत्ता के एक दूसरे केंद्र की चर्चा शुरू हो गई। बालेन शाह पर अध्यादेशों के सहारे सरकार चलाने, ओली को जल्दबाजी में गिरफ्तार कराने, कुछ लेख हटाने के अदालती आदेश और बिना चुने सलाहकारों पर ज्यादा भरोसा करने जैसे आरोप लगे। भारतीय सामानों पर कस्टम की सख्ती का फैसला भी भारी विरोध के बाद उन्हें वापस लेना पड़ा। इसी दौरान राइड-शेयर ड्राइवर गणेश नेपाली के आत्मदाह, सुनसारी और सिराहा में सांप्रदायिक झड़पों और माइतीघर में Gen Z के नए विरोध ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दीं। इन घटनाओं ने सिर्फ 150 दिनों में शाह की साख को बट्टा लगाया।

शासन चलाना कठिन । दुनिया में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि आंदोलन से बनी किसी सरकार की छवि धूमिल हुई हो। 1985 में असम में छह साल चले आंदोलन के बाद असम गण परिषद (AGP) की सरकार बनी। पार्टी ने 126 में से 67 सीटें जीतीं और 33 साल के प्रफुल्ल महंत राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। लेकिन, अनुभव की कमी और मजबूत संगठन के अभाव के कारण कुछ ही दिनों में उनकी साख गिरने लगी। ULFA के उभार, आर्थिक गड़बड़ियों और गुटबाजी के कारण 1990 में सरकार बर्खास्त कर दी गई। 1996 में एक बार फिर लोगों ने AGP पर भरोसा किया, लेकिन तब भी भ्रष्टाचार के आरोपों ने पीछा नहीं छोड़ा।

कई उदाहरण । करीब 12 साल पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार को भी पहली बार 49 दिनों में इस्तीफा देना पड़ा था। इटली के फाइव स्टार मूवमेंट का हश्र भी कुछ ऐसा ही हुआ। 2018 में जीत के बाद पूरा आंदोलन बिखर गया। मेडागास्कर में 2025 में Gen Z आंदोलन से एंड्री राजोएलिना को सत्ता गंवानी पड़ी। इन ऐतिहासिक घटनाक्रमों से पता चलता है कि आंदोलन से सत्ता मिलना तो आसान है, लेकिन शासन चलाना मुश्किल।

असल परीक्षा । बालेन शाह की असल परीक्षा अब शुरू हुई है। 26 अगस्त की सुबह त्रिशूली और भोटेकोशी नदियों में अचानक आई बाढ़ ने रसुवा और नुवाकोट जिलों में भारी तबाही मचाई। अब तक सैकड़ों लोगों की जान चली गई है और हजारों लापता हैं। हालांकि, मौजूदा संकट में शाह का नेतृत्व पहले से ज्यादा जिम्मेदार दिखा।

वापसी की उम्मीद । आंदोलन से बनी सरकारों की असल परीक्षा आपदा के दौरान होती है। राहत और पुनर्वास के लिए केंद्र, राज्य और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल जरूरी होता है। फिलहाल, सड़क, पुल और बिजली व्यवस्था दोबारा बहाल करना और विस्थापितों को बसाना शाह के लिए चुनौती है। अगर वह इसे संभाल लेते हैं, तो सरकार को नई दिशा मिल सकती है।

(लेखक स्कूल ऑफ इंटरनैशनल स्टडीज, JNU में असोसिएट प्रफेसर हैं)