Transparency In Corruption Equal Distribution Of Facilitation Fees And Sabka Saath Sabka Vikas
रिश्वत का समान वितरण
नवभारतटाइम्स.कॉम•
चंबल के डकैतों के भी कुछ उसूल थे। लूट का माल बांटते समय किसी का हिस्सा नहीं मारा जाता था। अब शायद उसूलों की यह परंपरा चंबल से निकलकर सरकारी व्यवस्था तक पहुंच गई है। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां लूट का माल था, यहां मामला कथित सुविधा शुल्क का है।
पिछले दिनों सोशल मीडिया पर कुछ पार्षदों का एक विडियो सामने आया, जिसमें वे गंगाजल हाथ में लेकर रिश्वत की रकम बराबर बांटने की शपथ ले रहे हैं। फिलहाल, मामले की जांच जारी है, इसलिए इसे आरोप ही मानना चाहिए। लेकिन, अगर आरोप सही निकला तो मेरे ख्याल से इसे भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि पारदर्शिता के नजरिए से देखना चाहिए। रिश्वत आजकल सुविधा शुल्क बन गया है। जब सुविधा के लिए शुल्क लिया जा रहा है तो उसमें किसी को कम और किसी को ज्यादा सुविधा क्यों मिले? समानता तो होनी चाहिए। हमारे इंजीनियर साहब इस विचार से इतने प्रभावित हैं कि उनका सुझाव है कि ‘सुविधाशुल्क समान वितरण आयोग’ बनाया जाए। आयोग सुनिश्चित करे कि सुविधा शुल्क का बंटवारा पारदर्शी हो, किसी का हिस्सा न कटे और हर लाभार्थी को उचित अधिकार मिले।वह कहते हैं कि भ्रष्टाचार में सबसे बड़ी बाधा भ्रष्टाचार नहीं, प्रबंधन की कमी है। इसके लिए पोर्टल बनाया जा सकता है- 'आपने कितना दिया, किसे दिया और किस अनुपात में बंटा', सब ऑनलाइन दिखेगा। आने वाले समय में भ्रष्टाचार खत्म करने की मांग भी पुरानी पड़ जाएगी और नई मांग होगी- भ्रष्टाचार में पारदर्शिता लाओ। विश्वविद्यालयों में नया पाठ्यक्रम शुरू होगा-‘भ्रष्टाचार में नैतिकता’। परीक्षा में प्रश्न आएगा- 'सुविधा शुल्क के 10.55 लाख रुपये चार लोगों में बराबर बांटने हों तो प्रत्येक को कितने मिलेंगे?' इंजीनियर साहब कहते हैं कि भ्रष्टाचार में भी ‘सबका साथ, सबका विकास’ लागू होना चाहिए।