मशीनें सब कर रही हैं, पर शिक्षकों के काम का एल्गोरिद्म नहीं
नवभारतटाइम्स.कॉम•
किसी को भी वह सटीक दिन याद नहीं होता, जब उसने पहली बार पढ़ना सीखा। लेकिन, लगभग हर व्यक्ति उन शिक्षक ों को जरूर याद रखता है, जिन्होंने उसे पढ़ाया। एक शिक्षक अपने पीछे ऐसी चीजें छोड़ जाता है, जिन्हें आसानी से आंक पाना संभव नहीं- कोशिश करने का आत्मविश्वास, डटे रहने का अनुशासन, सवाल पूछने की जिज्ञासा, या कभी-कभी मात्र यह भरोसा कि इंसान और भी बहुत कुछ कर सकता है। इसलिए, शिक्षण को एक कला से कम कुछ भी नहीं माना जा सकता।
राष्ट्रपति द्वारा हर वर्ष दिए जाने वाले ‘राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार’ वास्तव में उन चुनिंदा शिक्षकों का सम्मान है, जिनका योगदान दूसरों से कहीं बढ़कर रहा है। इनके अलावा भी देश के हर कोने में- चाहे वह कक्षा हो, कौशल प्रयोगशाला, पॉलिटेक्निक, खेल का मैदान या संगीत कक्ष, विद्यार्थी अपने शिक्षकों के प्रति आभार जताने का तरीका खोज ही लेते हैं।दुनिया को चाहिए करोड़ों शिक्षक
हालांकि, आंकड़े एक और चिंताजनक कहानी बताते हैं। ओईसीडी का 2026 का ‘टीचर नॉलेज सर्वे’ किसी विषय को जानने और उसे पढ़ा पाने की क्षमता के बीच के अंतर की ओर इशारा करता है। किसी चीज को गहराई से जानना और किसी दूसरे को उसे सीखने में मदद करना - ये दो अलग कौशल हैं। शिक्षण एक कला है, जिसमें मानवीय रिश्तों और पढ़ाने के तरीकों की समझ के साथ कक्षा में थोड़ी नाटकीयता भी जरूरी है।
यूनेस्को की ‘शिक्षकों से संबंधित वैश्विक रिपोर्ट 2024’ में इस पेशे की उपेक्षा की कीमत आंकड़ों में दिखाई देती है। दुनिया को 2030 तक 4.4 करोड़ अतिरिक्त प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों की जरूरत होगी। इनमें आधे से अधिक की जरूरत उन शिक्षकों की जगह लेने के लिए होगी, जो नौकरी छोड़ रहे हैं। वहीं, McKinsey Global Institute का अनुमान है कि ऑटोमेशन के कारण 2030 तक दुनिया भर में 7.5 करोड़ से 37.5 करोड़ कामगारों को अपना पेशा बदलना पड़ सकता है। ऐसे में योग्य शिक्षकों की अहमियत पहले से कहीं अधिक होगी।
भारत ने इस चुनौती को समय रहते भांप लिया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत शुरू किए गए चार-वर्षीय ‘एकीकृत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम’ में विषयगत निपुणता और शिक्षण-पद्धति को एक ही स्नातक डिग्री में शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को शिक्षण के पेशे की ओर आकर्षित करना है। प्रमोशन को पढ़ाने की गुणवत्ता से जोड़ा गया है। ‘नैशनल मिशन फॉर मेंटरिंग (NMM)’ शिक्षकों को विभिन्न क्षेत्रों के मार्गदर्शकों से सीखने के लिए व्यवस्थित सहायता प्रदान करता है। मैंने भी इस मिशन के लिए एक मेंटर के तौर पर पंजीकरण कराया है। बढ़ती इकॉनमी की जरूरत
भारत में ‘शिक्षक’ किसे माना जाए, इसका दायरा भी बढ़ाया जा रहा है। ‘समाज में सभी के लिए आजीवन सीखने की समझ (उल्लास)’ यानी ‘न्यू इंडिया लिटरेसी प्रोग्राम’ इस सिद्धांत पर आधारित है कि हर साक्षर व्यक्ति एक निरक्षर व्यक्ति को पढ़ा सकता है। इस वर्ष जब हम ‘अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस’ मना रहे हैं, तो इस कार्यक्रम के तहत नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पूरी तरह साक्षर घोषित किया गया है। शिक्षा मंत्रालय के 'विद्यांजलि' पोर्टल में भी यही भावना दिखाई देती है। यह पोर्टल 8.75 लाख से अधिक सरकारी स्कूलों को ऐसे वॉलंटियरों से जोड़ता है जो अपनी विशेषज्ञताओं - चाहे वह नृत्य से संबंधित हो या गणित से - को कक्षाओं में प्रदर्शित करते हैं। हर वॉलंटियर एक शिक्षक की भूमिका निभाता है। कोई भी कला कलाकारों में भेद नहीं करती। इसलिए संगीत या शारीरिक शिक्षा के शिक्षक को पूरक और व्यावसायिक शिक्षा के प्रशिक्षक को वैकल्पिक व्यवस्था मानना न केवल अनुचित, बल्कि गलत भी है। भारत की बढ़ती रचनात्मक अर्थव्यवस्था (ऑरेंज इकॉनमी) के साथ कला विद्यार्थियों को तेजी से बढ़ते नए क्षेत्रों के लिए तैयार करेगी।
आज के दौर में मशीनें लगभग हर काम कर रही हैं, पर एक शिक्षक की जगह वे कभी नहीं ले सकतीं। इस काम का कोई एल्गोरिदम नहीं है। यह स्कूल की घंटी बजने पर खत्म नहीं होता।
(लेखक केंद्रीय शिक्षा व कौशल विकास और उद्यमशीलता राज्यमंत्री हैं)