मिनी देशद्रोह

नवभारतटाइम्स.कॉम
the mini treason of appearing educated without reading books
मैं और मेरे साहित्यकार मित्र ऑनलाइन चर्चा में साथ जुड़े। मैंने देखा कि उनके बैकग्राउंड में ढेर सारी किताबों से सजी शेल्फ थी। मुझे खुशी के साथ जिज्ञासा हुई। चर्चा खत्म होने के बाद मैंने उन्हें फोन किया, 'आप इतना पढ़ते हैं, मुझे नहीं पता था। आपसे बात करने में मजा आएगा।' उन्होंने चाय पीने का न्योता दिया। मैं पहुंच गया उनके घर। उन्होंने कहा, 'जो किताब पढ़नी हो, ले सकते हो।' किताबें देखने के दौरान मैंने अतिउत्साह में कहा, 'इस उपन्यास का वह प्रकरण बेहतरीन है, क्यों?' साहित्यकार ने भारी-सी आवाज में कहा, 'हूं।' फिर मैंने एक कविता की दो पंक्तियां पढ़ीं, 'इन पंक्तियों ने आपके दिल को छुआ?' जवाब आया, 'हूं।' मैं तीसरी किताब उठाने ही वाला था कि साहित्यकार ने ऐनक के ऊपर से मुझे घूरा और पास बैठने का इशारा किया। उन्होंने कांखते हुए किलो भर गंभीरता ओढ़ी और बोले, 'ये सारी किताबें मैंने नहीं पढ़ी हैं।' 'आप तो अक्सर इनमें से बातें कोट करते हैं?' वह बोले, 'एक-दो लाइन कोट करने के लिए पूरा पोथा पढ़ने की जरूरत नहीं होती। फ्लैप पढ़ो, बहुत मन कर रहा है तो समीक्षा पढ़ लो। चर्चा के दौरान किताब की कोई भी दो लाइन कोट कर दो।'

तमाम सदमों के बावजूद मैंने खुद को समेटा और उनसे पूछा, 'तो आप पढ़े-लिखे...।' मेरा सवाल उन्होंने बीच में ही काट दिया, 'पढ़ा-लिखा होने से ज्यादा पढ़ा-लिखा दिखना जरूरी है। देश में कई लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं। अब अपने ...।' 'बस कीजिए साहित्यकार महोदय, इतना सच बर्दाश्त नहीं हो रहा है।' इस बार मैंने बात काट दी, वरना पता नहीं किसका नाम ले लेते और अपने साथ मुझसे भी मिनी देशद्रोह करवा ही देते।