Why The Silence On Surrogate Advertisements Promotion Of Deadly Products Continues
सरोगेट विज्ञापनों पर चुप्पी क्यों
नवभारतटाइम्स.कॉम•
विज्ञापन जगत से जुड़ी हाल की दो घटनाएं हमारे दोहरे मापदंडों को उजागर करती हैं। पहली घटना थी एक्ट्रेस कृति सैनन के रक्षाबंधन पर शूट किए गए विज्ञापन की। इसमें कृति की ड्रेस पर ऐसा बवाल मचा कि कंपनी को विज्ञापन हटाना पड़ा। दूसरी घटना है महाराष्ट्र FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे का शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को नोटिस देना। उन्होंने तीनों कलाकारों पर Surrogate Advertising का आरोप लगाया है।
बेकार की बहस । कहने के लिए ये कलाकार दिखते हैं विमल इलायची के विज्ञापन में, पर पूरी दुनिया जानती है कि कंपनी हकीकत में बनाती क्या है। यह विज्ञापन भी गुटखा खाने वाले लोगों की बढ़ती हुई जमात को लुभाने के लिए है, न कि इलायची के शौकीनों के लिए। इसके बावजूद विमल और तीनों कलाकारों का अपरोक्ष रूप से समर्थन किया जा रहा है और मुंढे के नोटिस को एक 'पब्लिसिटी स्टंट' बताया जा रहा है। चर्चा इस बात पर है कि यह कार्रवाई मुंढे के अधिकार क्षेत्र में आती भी है या नहीं।बैन बेअसर । मुंढे ने गंदगी और मिलावटखोरी के खिलाफ मुंबई में अभियान छेड़ा हुआ है। इसके तहत उन्होंने कई रेस्तरां और क्लबों के खिलाफ कार्रवाई की। सरोगेट एडवरटाइजिंग के खिलाफ उठाया गया उनका कदम निश्चित तौर पर काबिले तारीफ है, खास तौर पर इसलिए कि गुटखा और पान मसाला पर महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में प्रतिबंध लगा हुआ है। सरोगेट विज्ञापन का तरीका पुराना है। कई कलाकारों ने पहले शराब कंपनियों के लिए विज्ञापन किए हैं। इनमें उन्होंने सोडा या मिनरल वॉटर जैसे ऐसे प्रॉडक्ट्स बेचे, जो बाजार में बमुश्किल मिलते थे।
मौत का सामान । मौजूदा दौर में शराब से भी ज्यादा खतरा गुटखा या पान मसाला के सरोगेट विज्ञापनों से है। वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फंड के मुताबिक, दुनिया के ओरल कैंसर के एक तिहाई मरीज भारत में हैं। हमारे देश में हर घंटे औसतन पांच से भी ज्यादा लोगों की मौत इस बीमारी की वजह से हो रही है। डॉक्टर इस मर्ज का सीधा संबंध गुटखा या पान मसाला से जोड़ते हैं। विडंबना ही है कि लोगों को गुटखा-तंबाकू के खिलाफ चेताने में हमारी सरकारें हर साल करोड़ों खर्च कर देती हैं, लेकिन साथ में इनके सरोगेट विज्ञापन भी चलते रहते हैं।
पुराने विवाद । संस्कृति के नाम पर विवाद खड़ा करना और फिर दबाव बनाकर विज्ञापन हटवा देना, ऐसी मिसालें पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी हैं। कृति 'संस्कार-निष्ठ' लोगों का यह पहला निशाना नहीं हैं। करीब छह साल पहले जूलरी कंपनी तनिष्क को एक गोद-भराई की रस्म पर बना विज्ञापन इसलिए हटाना पड़ा था, क्योंकि उसमें एक हिंदू महिला को मुस्लिम परिवार में ब्याही हुई दिखाया गया था। पांच साल पहले दिवाली के मौके पर कपड़ों और अन्य वस्तुओं की कंपनी फैब इंडिया को भी सिर्फ इसलिए अपना विज्ञापन हटाना पड़ा, क्योंकि उसने हिंदू त्योहार के लिए उर्दू शब्द ‘जश्न-ए-रिवाज’ का इस्तेमाल किया था। तभी डिजाइनर सब्यसाची को भी अपने मंगलसूत्र कलेक्शन का विज्ञापन हटाना पड़ा था। वजह, उसमें समलैंगिक लड़कियों की जोड़ी को दिखाया गया था।
सौंदर्य परंपरा । जीवा के विज्ञापन पर अपना पक्ष रखते हुए कृति ने कहा था, 'संस्कृति या रीति-रिवाज एक महिला के हृदय में बसते हैं, न कि उसकी नेकलाइन में।' संस्कृति और संस्कारों की दुहाई देने वाले लोग शायद भारत की सौंदर्य परंपरा को भूल जाते हैं। करीब 42 साल पहले बनी फिल्म ‘उत्सव’ में रेखा ने वसंतसेना की भूमिका निभाई थी और वह कृति से भी कम वस्त्रों में नजर आई थीं।
सख्ती जरूरी । संस्कारों या धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोपों के बाद हटाए गए ज्यादातर विज्ञापनों की वापसी नहीं हुई है। इन कंपनियों ने लगभग माफी मांगने वाले अंदाज में बयान जारी किए। अफसोस, हमारे समाज का कोई भी वर्ग इतना प्रभावशाली नहीं रहा, जो सरोगेट एडवरटाइजिंग पर रोक लगा सके या कलाकारों पर दबाव डाल सके। कुछ साल पहले सोशल मीडिया पर आलोचना के बाद अमिताभ बच्चन ने खुद को पान मसाले के विज्ञापन से अलग कर लिया था। लेकिन, अमिताभ नहीं तो क्या, बॉलिवुड में दूसरे मिल जाएंगे। ऐसे में मुंढे जैसे साफ-सुथरी छवि वाले अधिकारियों को उनकी मुहिम में जन समर्थन की जरूरत है। गुटखा-तंबाकू पर बैन का सख्ती से पालन कराया जाए। सरोगेट विज्ञापनों पर रोक लगनी चाहिए।