किसने सोचा होगा कि यमन की एक मिलिशिया दुनिया की अर्थव्यवस्था की अहम नस पर हाथ रख देगी? हूतियों ने मोखा बंदरगाह और बाब-अल-मंदेब को नियंत्रित करने वाले द्वीपों पर कब्जा कर लिया है। लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित यह जलडमरूमध्य दुनिया के प्रमुख व्यापार और ऊर्जा मार्गों में से एक है।
2023 में हूती हमले शुरू होने से पहले यहां से रोजाना 93 लाख बैरल तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते थे, जो 2025 में घटकर 46 लाख बैरल रह गए। अप्रैल 2026 में ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट बंद किया तो सऊदी अरब अपना ज्यादा तेल ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन से लाल सागर भेजने लगा। इससे तेल कीमतों पर दबाव कम हुआ। लेकिन, हूती अब सऊदी शहरों, रिफाइनरियों और तेल पाइपलाइन को निशाना बना रहे हैं। सऊदी अरब ने तेल उत्पादन रोक दिया है। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को लेकर चिंता फिर बढ़ गई है।अमेरिका की कमजोर गारंटी
तेल की कीमतों पर असर दिखने लगा है। अगर सऊदी तेल का निर्यात इसी तरह प्रभावित रहा तो कीमतें और बढ़ सकती हैं। सऊदी अरब स्वेज नहर के रास्ते छोटे जहाजों से तेल भेज सकता है, लेकिन इससे उसका कुल निर्यात काफी घट जाएगा। इस संकट का सबसे बड़ा असर शायद आर्थिक नहीं, राजनीतिक हो। सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका को अपनी सुरक्षा का सबसे बड़ा गारंटर मानता रहा है। पिछले नवंबर में डॉनल्ड ट्रंप और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए रणनीतिक रक्षा समझौता किया था। लेकिन, जब हूतियों ने सऊदी ठिकानों को इस बार निशाना बनाया, तो ट्रंप ने सैन्य समर्थन देने से मना कर दिया। उन्होंने खुफिया जानकारी और लक्ष्य तय करने में मदद की पेशकश की है। ट्रंप ने ऐसा क्यों किया? दरअसल उन पर मिड टर्म इलेक्शन में हार का खतरा पहले ही मंडरा रहा है। वह कोई नया युद्ध नहीं चाहते, जिससे जनता की नाराजगी बढ़े।
सऊदी अरब ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के जरिए पाकिस्तान और तुर्किये से भी सुरक्षा सहयोग बढ़ाया है। इसमें कहा गया है कि एक पर हमला, सभी पर हमला। लेकिन, यहां भी बात खुफिया जानकारी और कुछ सैन्य मदद तक सीमित रह सकती है। यह समझौता सिर्फ कागजी साबित होता है, तो भारत के लिए राहत की बात होगी।
भारत पर असर का अंदेशा
आर्थिक असर फिलहाल साफ नहीं, लेकिन चिंता बढ़ाने वाला जरूर है। होर्मुज बंद होने के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था अब तक उम्मीद से ज्यादा मजबूती दिखा रही है। इसकी एक वजह चीन का तेल आयात घटाना और दूसरी सऊदी तेल को फारस की खाड़ी के बजाय लाल सागर के रास्ते भेजना रही है। लेकिन, अब सऊदी अरब का करीब 40 लाख बैरल तेल और रिफाइंड ईंधन लाल सागर से बाहर नहीं जा पाएगा। इससे कच्चे तेल से ज्यादा डीजल की कमी हो सकती है। वहीं, रूस की कई रिफाइनरियों पर यूक्रेनी हमलों से उसकी रिफाइनिंग क्षमता घटी है। इससे भी रिफाइंड ईंधन की कमी बढ़ी है।
भारत तेल का बड़ा आयातक है, पर रिफाइंड ईंधन का बड़ा निर्यातक भी है। लाल सागर बंद रहने पर रिफाइनरियों का मुनाफा बढ़ सकता है। घरेलू कीमतें नियंत्रित रखने के लिए सरकार निर्यात शुल्क और सब्सिडी का सहारा ले सकती है। होर्मुज और बाब-अल-मंदेब- दोनों लंबे समय तक बंद रहे तो सब्सिडी का बोझ बहुत बढ़ जाएगा और सरकार के सामने मुश्किल फैसले होंगे।