आत्मशुद्धि से शांति की राह दिखाता है पर्युषण

Contributed byडॉ. महावीर गोलेच्छा|नवभारतटाइम्स.कॉम
paryushan jain festival from self purification to world peace
जैन धर्म का पवित्र और आध्यात्मिक पर्व है पर्युषण । यह केवल उपवास, तप, जप और स्वाध्याय का अवसर नहीं, बल्कि आत्मावलोकन, आत्मशुद्धि और आत्मजागरण की गहन यात्रा है। यह हमें अपने भीतर झांकने, अपनी कमियों को पहचानने, अहंकार और आसक्ति को कम करने व सभी जीवों के प्रति करुणा, मैत्री और क्षमा का भाव विकसित करने की प्रेरणा देता है। पर्युषण का उद्देश्य कुछ दिनों तक धार्मिक अनुष्ठान करना भर नहीं, व्यक्ति के विचार, व्यवहार और जीवन-दृष्टि में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। यह बाहरी उपलब्धियों से भीतर की शांति , भौतिक संचय से अपरिग्रह और संघर्ष से सह-अस्तित्व की ओर ले जाने वाला पर्व है। जैन धर्म की श्रमण परंपरा में भगवान महावीर ने अहिंसा , अपरिग्रह और आत्मसंयम से जीवन को अधिक संवेदनशील और नैतिक बनाने का मार्ग दिखाया। उनके दर्शन में जीवन केवल मनुष्य तक ही नहीं, संसार के प्रत्येक जीव के अस्तित्व और चेतना के सम्मान से जुड़ा है।

अहिंसा केवल किसी जीव को शारीरिक कष्ट न पहुंचाने तक सीमित नहीं है। शब्दों से किसी को आहत न करना, व्यवहार में शोषण से बचना और विचारों में द्वेष न रखना भी अहिंसा है। इसी तरह क्षमा केवल दूसरे की गलती को माफ करना नहीं, अपने भीतर जमा क्रोध, अहंकार और द्वेष से मुक्त होने की प्रक्रिया है। क्षमावाणी का भाव हमें संबंधों की गांठें खोलने और अंतर्मन को हल्का करने का अवसर देता है। जैन दर्शन का संदेश है, ‘सभी जीवों के प्रति मेरी मैत्री है और किसी के प्रति मेरा वैर नहीं।’ आज जब दुनिया युद्ध, हिंसा, ध्रुवीकरण और बढ़ती भौतिक प्रतिस्पर्धा से जूझ रही है, यह संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
पर्युषण केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधना का पर्व नहीं, सामाजिक और वैश्विक जीवन को भी दिशा दिखाता है। आज मानवता को जिस शांति, सहिष्णुता और मैत्री की आवश्यकता है, पर्युषण उसके लिए आत्मशुद्धि से विश्व शांति तक की राह दिखाता है।